Thursday, 18 June 2026

ढरियहार वाले मियां चंदादरगाह की तामीर में सामान की शक्ल में मिलने वाले तआवुन की तफ्सील

ढरियहार वाले मियां चंदा
दरगाह की तामीर में सामान की शक्ल में मिलने वाले तआवुन की तफ्सील

🔹 समीम खान ( मजीद खान) — 1000 ईंटें पेश की हैं।

🔹 नजीम खान — 1 बोरी सीमेंट का तआवुन किया है।

🔹 समा ब्रिक भट्ठा(मोहम्मद इश्तियाक अंसारी+रियाजुद्दीन प्रधान और बाकी पार्टनर ) — 1000 ईंटें दी हैं।

🔹 इमदाद ( भट्ठा )— 500 ईंटों का तआवुन किया है।

🔹 इंडियन ब्रिक भट्ठा (मालिक: पप्पू+ इश्तियाक others ) — 500 ईंटें दी हैं।


🔹 अजहरी ब्रिक भट्ठा (मालिक: आमीन ) — 300 ईंटें दी हैं।

🔹 डायमंड साबरी ब्रिक (मालिक :मोइनुद्दीन अंसारी ) + नवी शेर(500 ईंटें ) — 1500 ईंटें दी हैं, साथ ही रोड़ा (गिट्टी snag brick) का भी तआवुन किया है।

अल्हम्दुलिल्लाह, इन तमाम हज़रात ने दरगाह की तामीर में ईंटों, सीमेंट और दूसरे जरूरी सामान के ज़रिये अपना कीमती हिस्सा डाला है। अल्लाह तआला सबके माल व जान में बरकत अता फरमाए, उनकी इस नेक खिदमत को अपनी बारगाह में कबूल फरमाए और इसका बेहतरीन अज्र अता करे। आमीन।

📌 कुल ईंटें हासिल हुईं: 5300 ईंटें

📌 दीगर सामान: 1 बोरी सीमेंट और रोड़ा (गिट्टी)

📌 इसके अलावा चंदे की रकम से लगभग ₹15,000 का सरिया, मौरंग, पथरिया और दूसरा तामीरी मटेरियल भी खरीदा गया है, जो दरगाह की तामीर में इस्तेमाल हो रहा है।

 ढरियहार वाले मियां चंदा टोटल चंदा = 
चंदा कीतारीख 08/06/2026

₹ 500 मरहूम हाजी छोटा बक्श अंसारी 
₹ 100 तौसीफ वालिद का नाम नन्नाकु 
₹ 20 + ₹300 अकील वालिद का नाम सूबेदार 12/06/2026
₹ 50 जहूर खान
₹ 50 + ₹500 लियाकत खान वालिद का नाम रिफ़ायत हुसैन खान( 12/06/2026)
₹ 20 जहीर खान
₹ 50 रिजवान वालिद का नाम लल्लू 
₹ 60 शमशाद वालिद का नाम इस्ली 
₹ 500 राजी़द खान वालिद का नाम मजीद खान
₹ 100 इकबाल वालिद का नाम लल्लू खान
₹ 100 पुत्तन खान वालिद का नाम सरताज खान
₹ 500 गौहर अली सैयद वालिद का नाम सैयद मोहम्मद 
₹ 100 राजेंद्र राठौर (तेली)
₹ 51 रामपाल राठौर (तेली)
₹ 51 झब्बू राठौर (तेली)
₹ 50 सुनील कुमार
₹ 100 इरफान खान वालिद का नाम लल्लू 
₹ 100 इरफान खान वालिद का नाम करमतुल्ला खान 
₹ 100 रफ़्फन खान “ करमतुल्ला खान 
₹ 200 जब्बास खान वालिद का नाम मुंशी खान
₹ 250 मेहनूश खान वालिद का नाम नन्हे खान
₹ 500 समीम खान वालिद का नाम मजीद खान
₹ 50 राशिद खान वालिद का नाम नत्थू खान
₹ 100 मेहताज वालिद का नाम बन्ने खान
₹ 200 इंतखार खान वालिद का नाम मुख्तियार
₹ 50 फिदा हुसैन खान
 ₹ 100 अनवर खान
 ₹ 50 नवाब खान वालिद का नाम इमदाद खान
 ₹ 50 इश्क़ खान वालिद का नाम कल्लू 
₹ 50 + ₹500 रिहान खान वालिद का नाम रहीस खान 12/06/ 2026
₹ 90 अख्तियार खान
₹ 20 फूल बाबू वालिद का नाम छुट्टन खान
 ₹ 100 हाशिम खान वालिद का नाम इकरार खान
₹ 50 सलीम खान
 ₹100 अयूब खान वालिद का नाम गुलशेर खान
₹ 100 अकरम खान बालिका नाम गुलशेर खान
₹ 50 यूनुस खान वालिद का नाम कल्लू खान
₹ 50 नदीम खान ( यूनुस खान के घर मेहमानों ने दिए)
₹ 50 लाइक खान ( यूनुस खान के घर मेहमानों ने दिए)
₹50 यासीन खान
₹100 + ₹ 200 रियासत खान वालिद का नाम रफत खान 12/06/2026
₹ 100 डॉक्टर निज़ाकत खान
₹ 100 जानू खान वालिद का नाम अनवर खान
₹ 50 मुन्नी खान वाइफ ऑफ अनवर खान
₹100 अनीश मिस्त्री वालिद का नाम सल्लू खान
₹ 100 तोहिद खान वालिद का नाम बुद्ध खान
₹ 100 मजले खान वालिद का नाम इसरार खान
₹ 100 मोहम्मद मियां
₹ 200 राफुल्ल खान ( दरगाह के खिदमतकार)
₹ 100 + ₹ 50 कौसर खान 12/06/2026
₹ 30 यासीन खान 
₹ 100 लल्ला खान 
₹ 200 रिहान खान (लल्ला खान के दामाद जी ने दिए) 
₹ 50 मियां खान 
 ₹100 मोहसिन खान वालिद का नाम मियां खान
₹ 50 चांद मियां खान वालिद का नाम बाला खान
₹100 कप्तान खान 
₹50 आरिफ खान
 ₹100 बाबू खान
 ₹120 जाबिर खान
₹500 मसरूल लाला (बेटे का नाम तसलीम खान)
 ₹ 50 एजाद खान वालिद का नाम अशफाक खान 
₹ 20 वालिद ने नाम नहीं बताया लेकिन बच्चे का नाम फैजान खान
₹20 फूल बाबू वालिद का नाम लाल खान
₹20 लाल खान
₹ 20 मिस्कन्ना इदरीसी
₹ 100 करारउद्दीन अंसारी
₹ 100 अजहरुद्दीन अंसारी वालिद का नाम खन्ना 
₹ 100 एजाद हुसैन शेख वालिद का नाम नन्हे
₹ 100 दिलशाद शेख
₹ 500 सरफउद्दीन अंसारी उर्फ कोटेदार
₹ 100 रईसउद्दीन अंसारी
₹ 100 कुतुबउद्दीनअंसारी
₹ 100 नाम बताया नहीं अंसारी में एक बूढी औरत ने दिए (खन्ना के घर के पास रहती है)
₹ 100 बशीर हसन इदरीसी
₹ 50 कदीर खान
₹ 11 चंदा शेख (उन्होंने अपनी खुशी से दिए बाकी उनके बच्चे देंगे)
₹100 आरिफ अंसारी वालिद नाम मेहंदी हसन
₹ 30 इकरार अंसारी
₹50 जान मोहम्मद
₹ 20 मोहम्मद आसिफ अंसारी
₹ 40 अनिसुद्दीन अंसारी
₹50 इसामउद्दीन अंसारी
₹10 (ईदउल हसन की बीवी ने दिए )
₹ 50 गुड्डू अंसारी वालिद का नाम नत्थू अंसारी
₹ 100 आशिक अली अंसारी
₹ 50 इकबाल अंसारी 
₹ 100 इस्हाक़ अली अंसारी
₹ 50 नूर हसन अंसारी खै़रे वाले
₹ 200+500 उम्रउद्दीन अंसारी (बेटे का नाम कलीमुद्दीन) 12/06/2026
₹ 200 शहजउद्दीन अंसारी वालिद का नाम खन्ना अंसारी
₹ 50 शकील अहमद वालिद का नाम नसीर अहमद
₹ 50 डॉ अशफाक अंसारी
₹ 20 राशिद इदरीसी 
₹ 50 मुन्नी इदरीसी (छुट्टू की बहन)
₹ 50 गुलअफशा अंसारी (रियाजुद्दीन प्रधान की बेटी)
₹ 50 हनीफ अंसारी वालिद का नाम नत्थू
₹ 51 अंसार अंसारी
₹ 100 कमलेश गुप्ता
₹ 100 अब्दुल बहार अंसारी
₹100 + 200 बन्ने खान 12/06/2026
₹100 जाहिद अली उर्फ बड़े लल्ला (तौफीक़ अंसारी)
₹500 नूरुद्दीन अंसारी ( मरहूम रहीसुद्दीन)
₹100 नसरुल्लाह इदरीसी और वालिद का नाम बुद्ध
₹100 मोहम्मद सदीक इदरीसी
₹ 200 मोहम्मद ज़ाकिर बिलसंडा
₹100 जमील हसन इदरीसी वालिद का नाम मसीतुल्लाह मास्टर 
₹1000 असगर खान (बेटे क्या नाम गुड्डू )
₹ 500 राणा भट्टे वाले ने रुपए दिए 
₹500 इकरार इदरीसी
₹500 कल्लू इदरीसी
₹500 कलीमउद्दीन अंसारी ( हाजी छोटे बक्श)
₹1000 सोनू मिश्रा और वालिद का नाम बूनी तिहार का प्रधान
₹500 गुलजार सिंह (पंजाबी)
₹200 लखबीर सिंह (पंजाबी)
₹200 सुखविंदर सिंह (पंजाबी)
₹200 नत्थू खैरे वाले 
अल्हम्दुलिल्लाह, दरगाह के पहले से मौजूद पैसों में से ₹10000 ( आबिद खान ) भाई ने जमा करा दिए हैं। इसके अलावा दरगाह का कुछ और पुराना पैसा भी बाकी है, जो अभी तक वसूल नहीं हुआ। बताया जा रहा है कि पहले का कुल बकाया लगभग ₹14000 से ज़्यादा है। फिलहाल सिर्फ ₹10000 प्राप्त हुए हैं, जबकि बाकी रकम मुख्तलिफ लोगों के पास है, जो इंशाअल्लाह मिलने पर हिसाब में शामिल कर ली जाएगी।
Date 12 june 2026

 ₹200 सलीम इदरीसी नातेदार
₹ 300 गुड्डू इदरीसी नातेदार
₹200 अकरम हुसैन   
₹1000 रवि सिंह झाला (लवदीप सिंह के माध्यम से हासिल हुए रवि के नातेदार)
₹3000 सीमेंट के लिए दिए है ।(दोस्त ने )
₹500 गुड्डू खान 
₹200 नसीम खान 
₹100 अब्दुल सत्तार अंसारी 
₹ 200 सलीम हुसैन 
₹ 50 उस्मान खान 
₹200 जुल्फिकार खान 
₹100 नाजिम खान
₹100 महीश खान मिस्त्री 
₹ 100 एहसान खान मिस्त्री
₹200 आरिफ खान 
₹1100 पान सिंह प्रधान पंजाबी झाला डिमरई
₹ 100 गोपी सिंह पंजाबी झाला 
₹ 1000 बलकार सिंह पंजाबी झाला 
₹ 200 दिलबाग सिंह 
₹ 2600 दरगाह के पहले के पैसे मिले हैं फैजान अंसारी उर्फ गुड्डू के माध्यम से मिले।
₹500 गुड़िया इदरीसी (नसरुल्लाह की बेटी)
 ₹700 साजिद अली अंसारी वालिद का नाम आबिद अली अंसारी 
₹300 सोनो अंसारी वालिद का नाम आबिद अली अंसारी 
₹500 शेर खान वालिद का नाम छोटे खान
₹100 दीन मोहम्मद अंसारी
गोपाल मास्टर ने एक सीमेंट की बोरी दी है।
₹500 फैयाज हुसैन खान 
 ₹200 शमशाद शेख 
₹1100 नदीम मुर रहमान वालिद नाम अतिकुर रहमान 
दरगाह के पुराने ₹5000 आबिद ख़ान के पास अमानत के तौर पर जमा थे, जिन्हें उन्होंने दरगाह के लिए वापस दे दिया है।
दरगाह की तामीर में मौरंग, सरिया और बजरी की ख़रीद के लिए ₹5000 कलीमुद्दीन अंसारी वालिद मरहूम हाजी छोटा बक्श अंसारी ने दिए थे।
₹ 2000 आबिद खान
₹200 शकील मंसूरी मिस्त्री बरेली वाले


दरगाह की अमानत/रकम का विवरण
🔹 ₹2600 फैज़ान अंसारी साहब के पास दरगाह की अमानत के तौर पर जमा थे, जिन्हें उन्होंने वापस अदा कर दिया है।
🔹 ₹10000 आबिद ख़ान साहब के पास दरगाह की अमानत के तौर पर जमा थे, जिन्हें उन्होंने भी वापस अदा कर दिया है।
🔹 वसीम उर्फ़ मुल्ला जी के ज़िम्मे ₹2000 दरगाह की रकम बाकी है, जो अभी तक अदा नहीं की गई है।
नोट: जिन लोगों के पास दरगाह की कुल ₹12,600 अमानत/रकम थी, उन्होंने वह रकम वापस कर दी है। केवल वसीम उर्फ़ मुल्ला जी के ज़िम्मे ₹2000 बाकी है, जो अभी प्राप्त होना शेष है।

अल्हम्दुलिल्लाह, दरगाह की तामीर में जिन-जिन हज़रात ने नक़द चंदा, ईंटें, सीमेंट, रोड़ा (गिट्टी), सरिया, मौरंग, बजरी या किसी भी दूसरी शक्ल में तआवुन किया है, उनका नाम इस हिसाब-किताब की लिस्ट में दर्ज है।
जिन लोगों ने किसी भी प्रकार का चंदा, रकम या तामीरी सामान नहीं दिया है, उनका नाम इस लिस्ट में शामिल नहीं किया गया है।
महत्वपूर्ण नोट

इस लिस्ट में सिर्फ उन्हीं लोगों के नाम दर्ज किए गए हैं जिन्होंने दरगाह की तामीर के लिए नक़द चंदा दिया है या ईंट, सीमेंट, रोड़ा (गिट्टी), सरिया, मौरंग, बजरी अथवा किसी अन्य तामीरी सामान की शक्ल में तआवुन किया है।
जिन लोगों ने न तो कोई चंदा दिया है और न ही किसी प्रकार का तामीरी सामान दिया है, उनका नाम इस लिस्ट में शामिल नहीं किया गया है।
यह पूरा हिसाब-किताब और तफ़सील शकीलुद्दीन अंसारी के ज़रिए दर्ज की गई है।

इस लिस्ट में सिर्फ उन्हीं लोगों के नाम शामिल किए गए हैं जिन्होंने दरगाह की तामीर के लिए किसी न किसी शक्ल में तआवुन किया है, चाहे वह नक़द चंदे की सूरत में हो, ईंट, सीमेंट, रोड़ा (गिट्टी), सरिया, मौरंग, बजरी या किसी अन्य तामीरी सामान की शक्ल में हो।
चंदे की रकम कम हो या ज़्यादा, उससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता। इस लिस्ट में हर उस शख्स का नाम दर्ज किया गया है जिसने अपनी हैसियत के मुताबिक़ दरगाह के लिए किसी भी रूप में मदद की है।
जिन लोगों ने दरगाह की तामीर के लिए किसी भी प्रकार का चंदा, सामान या तआवुन नहीं किया है, उनका नाम इस लिस्ट में शामिल नहीं किया गया है।
सामान जमा होने का विवरण

दरगाह की तामीर के लिए खरीदा गया 4 पीस सरिया (पूरा सेट) तथा पिलर/कलम के रिंग (कुल वजन 11 किलो 700 ग्राम) फिलहाल विकास गुप्ता की दुकान पर सुरक्षित रूप से जमा करा दिए गए हैं।
सरिया का अंतिम वजन अभी पुष्टि (कन्फर्म) होना बाकी है। जब भी दरगाह की तामीर का काम दोबारा शुरू होगा, यह सामान विकास गुप्ता की दुकान से वापस प्राप्त कर लिया जाएगा।
सामान दुकान पर अमानत के तौर पर रखा गया है और आवश्यकता पड़ने पर उसी वजन और हिसाब के अनुसार दरगाह की तामीर में इस्तेमाल किया जाएगा।

     दरगाह की तामीर हेतु जमा मटेरियल का विवरण

🔹 सरिया — 45.150 किलोग्राम (वजन अनुसार)

🔹 कलम के रिंग — 11.700 किलोग्राम (वजन अनुसार)

उपरोक्त दोनों मटेरियल दरगाह/मजार की तामीर के लिए सुरक्षित रूप से विकास गुप्ता जी की दुकान पर जमा कर दिए गए हैं।

जब भी दरगाह की तामीर या कोई निर्माण कार्य शुरू किया जाएगा, तब यही मटेरियल अपने जमा किए गए वजन के अनुसार वापस प्राप्त कर लिया जाएगा।

अर्थात, 45.150 किलोग्राम सरिया तथा 11.700 किलोग्राम कलम के रिंग, कुल जमा वजन के बराबर मटेरियल भविष्य में दरगाह के कार्य हेतु लिया जाएगा।

नोट: यह मटेरियल अमानत के तौर पर जमा है और दरगाह की तामीर शुरू होने पर उसी वजन के अनुसार वापस लिया जाएगा।


दरगाह का खर्चा दरगाह का खर्चा हिसाबदिनांक: 09 जून 2026 से 17 जून 2026 तकदरगाह का खर्चा

हज़रत सैयद शैख़ सलाहुद्दीन रहमतुल्लाह अलैह

उर्फ़ डढ़िया वाले मियां

दरगाह का खर्चा हिसाब
दिनांक: 09 जून 2026 से 17 जून 2026 तक
दरगाह का खर्चा 
साजिद ने रेता की ढुलाई के पैसे नहीं लिए
9 जून को ढाई सौ रुपए की मिठाई लिए दरगाह के लिए
9 जून को (₹120 का पेट्रोल भरवाया सिंगापुर में कर्मचारियों के लिए लाने के लिए मुल्लाजी की मोटरसाइकिल में)
3 तीन मजदूर चले हैं उनके ₹900 देने हैं उनके ₹900 दे दिए
…..
मजदूर सैलरी 
साईंम =300
मुसीम =300
शोएब =150(हाफ मजदूरी करी)
हनीफ=300
Total=1050

10 जून 2026
₹1000 अबरार ट्रैक्टर के ढुलाई के लिए 
₹30 मजदूर को गुटखा खाने के लिए 
₹100 का मोटरसाइकिल में पेट्रोल₹ 100 ईट भरवाने वालों का मजदूरी लोगों ने ₹100 का खाना खाया।
₹ 100 ट्राली ट्रैक्टर की मेजरमेंट यानी भजन के कांटे के रुपए 
बरेली से शकील मिस्त्री आए हैं₹200 का पेट्रोल और उनके खान के लिए ₹640 जितने दिन भी रुकेंगे 
₹ 200 मजदूरी ढुलाई के लिए 

₹15000 चंदा में से दिए और ₹5000 अपनी तरफ से मिलाए है मौरंग और बजरी के और सरिया के रुपए जमा किए हैं।

4 मी ट्रिपाल₹400 का₹100 का पेट्रोल गाड़ी में 
………….
11 june 2026
₹500 अबरार ट्रैक्टर के लिए तेल पैसे दिए हैं
₹120 का पेट्रोल
 
मजदूर सैलरी 
शकील मंसूरीमिस्त्री =500 +500 ( वसीम के माध्यम से)=1000 total 
मुसीम =300
शोएब =300

12 june 2026

₹120 मुल्लाजी की गाड़ी में पेट्रोल डलवाया चंदा करने के लिए

13 June 2026
₹40 आरी के 4 ब्लड खरीदे हैं l
₹120 +20 मोटरसाइकिल में पेट्रोल + धागा 
₹ 1000 मिस्त्री को पेमेंट किया है 
₹ 160 कोलम (पीलर )बांधने के लिए बान( बान रस्सी )
है ।
₹ 4000 मौरंग बजरी की दुकान पर ₹4000 जमा किए हैं।
14/06/2026 यही 
पिलर के रिंग + और तार और प्लस ब्रश =
रिंग बनवाने का चार्ज =116
24.150X 75=1811
1 .250 X 110किलो तार =137
एक ब्रश कर वाला =30
टोटल रुपया=2094 payment 

₹250 वसीम इदरीसी मजदूरी के 
₹104 रुपए पेट्रोल
₹600 समीउद्दीन 2 दिन की मजदूरी के पैसे
 
15/06/2026
₹ 2590 सीमेंट की 7 बोरी
₹100 सीमेंट ट्रांसपोर्ट  
₹ 20 मिस्त्री के लिए दो साबुन एक नहाने वाला एक कपड़े धोने वाला।
₹ 1000 आसिफ अंसारी मिस्त्री की मजदूरी 
₹300 समीउद्दीन 1 दिन की मजदूरी के पैसे
₹100 वसीम इदरीसी उर्फ मुल्लाजी को पैसे दिए हैं 
₹90 बच्चों को पैसे दिए चीज खाने के लिए उनसे ईट उठाने का काम करवाया।

16/06/2026
₹1500 शकील मिस्त्री मजदूरी 
₹ 1520 चार बोरी सीमेंट के लिए और थोड़े पैसे पिछले रिमेनिंग के लिए। 
₹100 कलम के फ्रेम सपोर्टर का चार्ज (इकबाल टाल वाले)
₹ 124 बच्चों को पैसे दिए चीज खाने के लिए उनसे ईट उठाने का काम करवाया।
₹800 आसिफ भाई को आज की दिहाड़ी और बाकी पिछली बचे हुए पैसे ।
₹300 समीउद्दीन 1 दिन की मजदूरी के पैसे
₹120 पेट्रोल मोटरसाइकिल के लिए ।

17/06/2026
₹300 आसिफ अंसारी मिस्त्री हाफ काम
₹300 समीउद्दीन 1 दिन की मजदूरी के पैसे
₹500 शकील मिस्त्री मंसूरी हाफ मजदूरी ट्रांसपोर्ट का चार्ज। 
₹300 वसीम इदरीसी 1 दिन की मजदूरी के पैसे
₹60 खुला हुआ सीमेंट 6 किलो 
₹ 123 बच्चों को पैसे दिए चीज खाने के लिए उनसे ईट उठाने का काम करवाया।
₹ 130 खर्च का पीडीएफ हार्ड कॉपी में प्रिंट आउट के 
₹120 का पेट्रोल मुल्लाजी की मोटरसाइकिल में डलवाया


दरगाह में जितना भी चंदा प्राप्त हुआ था, उसमें से आवश्यक खर्च करने के बाद जो भी रकम बची, वह पूरी रकम वसीम इदरीसी उर्फ़ मुल्ला जी के सुपुर्द कर दी गई है।

बची हुई रकम का विवरण

दरगाह की तामीर में जितना भी खर्च हुआ, उसके बाद ₹900 रकम बची थी।

यह ₹900 वसीम इदरीसी उर्फ़ मुल्ला जी को अमानत के तौर पर सुरक्षित रखने के लिए सौंप दिए गए हैं।

जब भी दरगाह की तामीर का काम दोबारा शुरू होगा, यह ₹900 वापस लेकर दरगाह के काम में खर्च किए जाएंगे।

यह रकम दरगाह की बची हुई अमानत है और भविष्य में तामीरी काम के लिए महफ़ूज़ रखी गई है।
 
17 जून 2026 




Tuesday, 21 April 2026

बर्ड मीनिंग

👉 “दोमुंहा” (दो मुँह वाला)
मतलब: जो अलग-अलग लोगों के सामने अलग-अलग बातें करे।

👉 “दोगला”
मतलब: जिसकी बातें और व्यवहार एक जैसे न हों, दोनों तरफ अलग-अलग खेल खेले।

👉 “मुनाफ़िक़” (मुनाफिक)
मतलब: ऊपर से कुछ और, अंदर से कुछ और — हर जगह खुद को सही दिखाने वाला।

👉 “दोहरी सोच वाला” / “दोहरे चरित्र वाला”
मतलब: एक ही समय में दो तरफ अलग-अलग बातें करना।

👉 “पाखंडी”
मतलब: दिखावा करने वाला, सच्चाई छुपाकर खुद को सही साबित करने वाला।

सीधी भाषा में समझो:
जो इंसान दोनों तरफ अलग-अलग बोलकर खुद को हर हाल में सही दिखाना चाहता है — उसे दोमुंहा, दोगला या मुनाफिक कहा जाता है।



1️⃣ जो इंसान जहाँ फायदा देखे, तुरंत उसी तरफ हो जाए:
👉 “मौकापरस्त”
मतलब: जो अपने फायदे के हिसाब से पक्ष बदलता रहे।

2️⃣ जो अपना काम निकालकर बाद में धोखा दे:
👉 “धोखेबाज़”
👉 “मतलबी”

3️⃣ जो अपने फायदे के लिए इस्तेमाल करे और बाद में छोड़ दे:
👉 “मतलबी”
👉 “खुदगर्ज”

4️⃣ जो पहले साथ खुश रहे और फिर छोड़ दे:
👉 “बेवफ़ा”
👉 “वादा तोड़ने वाला” (बदअहद)

एक लाइन में समझो:

फायदा देखकर बदलने वाला → मौकापरस्त
काम निकालकर धोखा देने वाला → धोखेबाज़ / मतलबी
इस्तेमाल करके छोड़ देने वाला → खुदगर्ज / मतलबी
साथ छोड़ देने वाला → बेवफ़ा


1️⃣ जो गलत को गलत नहीं बोलता, सिर्फ एक तरफा बात करता है:
👉 “पक्षपाती”
👉 “नाइंसाफ़” (न्याय न करने वाला)

2️⃣ जो जिधर फायदा दिखे उधर हो जाए:
👉 “मौकापरस्त”
👉 “मतलबी”

3️⃣ जो हर हाल में खुद को सही साबित करना चाहता है (चाहे गलत हो):
👉 “जिद्दी”
👉 “अहंकारी” (घमंडी)

4️⃣ जो अपनी इज्जत बचाने के लिए बड़ों का इस्तेमाल करे, चाहे उनकी इज्जत खराब हो जाए:
👉 “खुदगर्ज”
👉 “बेजिम्मेदार”
👉 “एहसान फरामोश” (जिसने बड़ों का मान नहीं रखा)

5️⃣ जो दूसरों को सिर्फ अपना स्टेटस दिखाने के लिए इस्तेमाल करे:
👉 “दिखावटी”
👉 “रियाकार” (पाखंडी)

1️⃣ जो छोटे को गिराकर खुद को बड़ा दिखाए:
👉 “नीच मानसिकता वाला”
👉 “घटिया सोच वाला”
👉 “कमज़ोर चरित्र वाला”

2️⃣ जो दूसरों को नीचा दिखाकर अपनी इज्जत बनाना चाहता है:
👉 “अहंकारी” (घमंडी)
👉 “खुदगर्ज”
👉 “दिखावटी”

3️⃣ जो रिश्तेदारी में छोटे को दबाकर खुद को इज्जतदार दिखाए:
👉 “पाखंडी” (रियाकार)
👉 “मुनाफिक” (बाहर कुछ, अंदर कुछ और)

4️⃣ जो थोड़ा सा काम करके या छोटा एहसान करके बार-बार लोगों को बताए:
👉 “एहसान जताने वाला”
👉 “शो-ऑफ करने वाला”
👉 “डींग मारने वाला”

5️⃣ जो दूसरों को गिराकर अपनी तारीफ करवाना चाहता है:
👉 “स्वार्थी”
👉 “मतलबी”

सीधी और कड़ी बात:
ऐसा इंसान असल में खुद को बड़ा नहीं बनाता,
बल्कि अपनी कमज़ोरी छुपाने के लिए दूसरों को छोटा करता है।


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Saturday, 18 April 2026

हकीक की कहानी ।

कभी-कभी ज़िंदगी ऐसे मोड़ पर ला खड़ा करती है, जहाँ इंसान सिर्फ पढ़ाई या काम नहीं कर रहा होता… बल्कि हालात से लड़ भी रहा होता है।

वो लॉकडाउन का वक्त था… जब हर बच्चा अपने सपनों को बचाने की कोशिश कर रहा था। मैं भी उन्हीं में से एक था… दसवीं क्लास का एक स्टूडेंट… जिसके पास न ठीक से मोबाइल था, न कोई बड़ी सुविधा… बस एक पुराना सा कंप्यूटर… और दिल में कुछ बनने की उम्मीद।

नीचे कमरे में बैठकर, उसी कंप्यूटर पर मैं अपने लेक्चर देखता था… हर दिन, हर वक्त… क्योंकि मेरे लिए वो सिर्फ पढ़ाई नहीं थी… वो मेरा भविष्य था।

लेकिन… कुछ लोग ऐसे होते हैं जिन्हें दूसरों की मेहनत, दूसरों की तकलीफ, कुछ भी दिखाई नहीं देता।

जब मैं अपने बायोलॉजी के लेक्चर में लगा होता… तभी जानबूझकर कमरे में आकर शोर करना… फोन पर ऊँची-ऊँची आवाज़ में बात करना… और सिर्फ इतना ही नहीं… ऐसी गंदी गालियाँ देना… जिन्हें सुनकर आत्मा तक काँप जाए…

सोचिए… एक बच्चा अपने भविष्य के लिए पढ़ रहा है… और उसके सामने इस तरह का माहौल बनाया जाए… तो उसके दिल पर क्या गुजरती होगी?

वो गालियाँ सिर्फ शब्द नहीं थीं… वो मेरे सपनों पर वार थे।

मैंने सबको सुनाया… अब्बा को, अम्मा को… सबको दिखाया… लेकिन वक्त बीतता गया… और हालात वही रहे।

मैंने लड़ाई नहीं की… क्योंकि मुझे सिखाया गया था कि इज़्ज़त से रहो… बड़ों का सम्मान करो… लेकिन क्या हर बार चुप रहना ही सही होता है?

जब कोई इंसान बार-बार आपको परेशान करे… आपकी पढ़ाई रोके… आपको मानसिक तौर पर तोड़े… तो वो सिर्फ बदतमीज़ी नहीं होती… वो ज़ुल्म होता है।

मैंने जगह बदली… कमरा छोड़ा… अपने मोबाइल से पढ़ना शुरू किया… लेकिन वहाँ भी चैन नहीं मिला… दरवाज़े बंद करना… परेशान करना… बार-बार दखल देना…

एक दिन तो हद ही हो गई… बिना किसी वजह के आकर मेरा कॉलर पकड़ लिया गया…

सोचिए… एक बच्चा जो सिर्फ पढ़ना चाहता है… उसके साथ ये सब क्यों?

क्या यही इंसानियत है?
क्या यही एक औरत की पहचान होनी चाहिए?

एक अच्छी औरत वो होती है जो घर को सुकून दे… जो बच्चों के सपनों को समझे… जो दूसरों के लिए रहम रखे…

लेकिन यहाँ तो उल्टा था… हर रोज़ दिल तोड़ने वाली हरकतें… हर रोज़ इज्ज़त को ठेस पहुँचाना…

आज भी जब वो दिन याद आते हैं… दिल भारी हो जाता है…

क्योंकि वो सिर्फ परेशानियाँ नहीं थीं… वो मेरी जिंदगी के सबसे अहम वक्त में दिया गया दर्द था…

मैंने सहा… क्योंकि मैं झगड़ा नहीं चाहता था…
मैंने सहा… क्योंकि मुझे अपने सपनों से प्यार था…

लेकिन सच यही है…
हर चुप रहने वाला इंसान कमजोर नहीं होता…
कभी-कभी वो सिर्फ अपने सपनों को बचा रहा होता है…

और एक दिन…
वही खामोश इंसान…
सबसे ऊँची आवाज़ बनकर सामने आता है।
.........
वो लॉकडाउन का समय था…
जब पूरी दुनिया रुकी हुई थी, लेकिन एक छात्र के सपने नहीं रुके थे।

मैं उस समय दसवीं क्लास में था…
मेरी क्लास अलीगढ़ से ऑनलाइन चला करती थी।
लेकिन मेरे पास ऐसा मोबाइल नहीं था जिस पर ठीक से ऑनलाइन लेक्चर चल सके… एक मोबाइल था भी, लेकिन उसमें बार-बार दिक्कत आती थी… वीडियो रुक जाता था, आवाज़ साफ नहीं आती थी।

इसी वजह से…
घर के नीचे, जहाँ मोइनुद्दीन भाई का कमरा था…
वहीं पर कलीमुद्दीन भैया का CPU और LCD लगा हुआ था…
यानी एक कंप्यूटर… और वही मेरे लिए उस वक्त मेरी पूरी दुनिया था।

मैं उसी कंप्यूटर पर अपने लेक्चर देखा करता था…
हर दिन… पूरी लगन से… क्योंकि मेरे लिए वो सिर्फ पढ़ाई नहीं थी… वो मेरा भविष्य था।

लेकिन उसी समय…
गुलफाश भाभी ने जानबूझकर मेरे उस माहौल को खराब करना शुरू किया।

जब मेरा साइंस, खासकर बायोलॉजी का लेक्चर चल रहा होता…
वो जानबूझकर उसी कमरे में आ जाती…
मोबाइल पर ऊँची आवाज़ में बात करती…
कभी किसी “खालू” से… कभी “खाला” से…
लेकिन जिस अंदाज़ में बात करती… वो सिर्फ बात नहीं होती थी…

एक बार तो हद ही हो गई…
उसने इतनी गंदी-गंदी गालियाँ दीं…
कि कोई भी शरीफ औरत अपने मुँह से ऐसे शब्द निकाल ही नहीं सकती।

और सबसे दुख की बात ये थी…
वो सब मेरे लाइव ऑनलाइन लेक्चर में रिकॉर्ड हो गया…
मेरी पढ़ाई के बीच… मेरे टीचर के सामने… मेरी पूरी क्लास के सामने…

सोचिए… उस वक्त मेरे दिल पर क्या गुज़री होगी।

मैंने वो रिकॉर्डिंग अपनी किताब में सेव रखी…
फिर अपने अब्बा को सुनाई…
अम्मा को भी सुनाई…
अनस अकीलउद्दीन और बाकी सबको भी सुनाया…

लेकिन कुछ दिनों बाद वो मोबाइल ही खराब हो गया…
और बाद में वही मोबाइल “भट्ट पर जो भंडारी थे” उन्हें भेज दिया गया…
और वो एक सबूत भी जैसे मेरे हाथ से चला गया।

लेकिन दर्द… वो वहीं रह गया।

ये सब एक बार नहीं…
कई बार हुआ…
बार-बार वो जानबूझकर ऐसा करती रही…
हमने हर बार इग्नोर किया… सिर्फ इसलिए कि घर में लड़ाई ना हो।

लेकिन उसकी हरकतें यहीं नहीं रुकीं…

जब मैं दीवान पर लेटकर पढ़ाई करता था…
तो वो जानबूझकर चीज़ें हटा देती…
कभी कूलर बंद कर देती…
कभी बिना वजह परेशान करती…

आखिरकार…
मजबूर होकर मैंने वो कमरा ही छोड़ दिया।

फिर साइड वाले कमरे में जाकर…
अपने ही मोबाइल से लेक्चर देखना शुरू किया…
भले ही दिक्कत होती थी… लेकिन सुकून था।

लेकिन वहाँ भी चैन नहीं मिला…

वो साइड वाले ब्लॉक में दिन में ताला लगा देती…
ताकि मैं वहाँ भी आराम से पढ़ ना सकूँ…

एक दिन तो ऐसा हुआ…
कि पंखा चलते-चलते अपने आप गिर गया…
उसकी पंखुड़ी टूट गई…
और उल्टा मुझसे कहने लगी — “तू इसे लेकर आ…”

मैं उस वक्त मस्जिद के पास था…
तभी उसका कॉल आया…
पूछने लगी — “कहाँ हो?”
लेकिन बात करने का लहजा गलत था… अपमानजनक था…

मैंने तुरंत फोन काट दिया…
क्योंकि वहाँ बहुत लोग थे… माहौल ठीक नहीं था।

फिर उसने दोबारा कॉल करके पूछा — “तुमने मेरी कॉल क्यों काटी?”
और इस छोटी सी बात को लेकर…

पता नहीं उसने मेरे भाई को क्या समझाया…
कैसे बात घुमाई…

और एक दिन…
जब मैं अपने लेक्चर पर था…
तो अचानक आकर उसने मेरा कॉलर पकड़ लिया…

सोचिए…
एक बच्चा… जो सिर्फ पढ़ना चाहता है…
जिसका कोई गलत इरादा नहीं…
जो सिर्फ अपने भविष्य के लिए मेहनत कर रहा है…

उसके साथ ये सब क्यों?

क्या ऐसी हरकत करने वाली औरत को “अच्छी औरत” कहा जा सकता है?

एक अच्छी औरत वो होती है…
जो घर में सुकून दे…
जो बच्चों की पढ़ाई और उनके सपनों को समझे…
जो दूसरों का सम्मान करे…

लेकिन यहाँ तो उल्टा ही था…
हर रोज़ बेइज़्ज़ती…
हर रोज़ मानसिक परेशानी…
हर रोज़ एक नया दर्द…

आज भी जब वो दिन याद आते हैं…
तो दिल भर आता है…

क्योंकि वो सिर्फ कुछ घटनाएँ नहीं थीं…
वो मेरे जीवन के सबसे महत्वपूर्ण समय में मिला हुआ दर्द था…

मैंने सहा…
क्योंकि मैं झगड़ा नहीं चाहता था…
मैंने सहा…
क्योंकि मुझे अपने सपनों से प्यार था…

लेकिन सच यही है…

हर चुप रहने वाला इंसान कमजोर नहीं होता…
कभी-कभी वो बस अपने सपनों को बचा रहा होता है…

और एक दिन…
वही खामोश इंसान…
अपनी मेहनत से इतना ऊँचा उठता है…
कि दुनिया उसकी आवाज़ खुद सुनती है।

2014 के बाद से…
उनका एक ही मकसद बन गया था —
कि इस घर में सिर्फ उनकी चले।

वो चाहती थीं कि घर का हर फैसला…
हर छोटी-बड़ी बात…
सिर्फ उन्हीं से पूछकर हो…

यहाँ तक कि…
घर के बच्चे भी अपने अम्मा-अब्बा की बात ना मानें…
बल्कि सिर्फ उनकी बात मानें…

वो चाहती थीं कि हर कोई…
अपने माँ-बाप से मशवरा लेने के बजाय…
सिर्फ “उनसे” और उनके शौहर से ही सलाह ले…

उनकी सोच ये थी कि —
इस घर में कोई भी अपनी राय ना दे…
यहाँ तक कि मेरे अम्मा और अब्बा भी नहीं…

बस वही एक फैसला करें…
वही एक रास्ता दिखाएँ…
और बाकी सब बिना सवाल किए… उसी पर चलें।

यानी… वो घर नहीं…
एक हुकूमत बनाना चाहती थीं…

जहाँ हर आवाज़ दब जाए…
और सिर्फ एक आवाज़ गूँजे…

जैसे कोई “विक्टोरिया” की तरह राज करना चाहती हो…
जहाँ सबको झुककर सिर्फ उसी से मशवरा लेना पड़े…

और जो कोई इस रास्ते पर ना चले…
उसे तंग किया जाए…
उसे दबाया जाए…
उसे मजबूर किया जाए…

मेरे साथ जो हुआ…
वो सिर्फ बदतमीज़ी नहीं थी…
वो एक सोची-समझी कोशिश थी…

मुझे तोड़ने की…
मुझे झुकाने की…
मुझे मजबूर करने की… कि मैं भी उसी के मुताबिक चलूँ।

लेकिन मैंने क्या किया?

मैंने लड़ाई नहीं की…
मैंने झुकना भी नहीं चुना…

मैंने बस अपना रास्ता बदला…
अपनी पढ़ाई जारी रखी…
................
कुछ कहानियाँ सिर्फ घटनाएँ नहीं होतीं…
वो दर्द का पूरा हिसाब होती हैं…
जो सालों तक दिल में जमा होता रहता है… और एक दिन शब्द बनकर बाहर आता है।

यह कहानी भी ऐसे ही एक दर्द की है…

तिलहर वाला पूरा भट्ट भट्ठा…
और बड़े गाँव वाला पूरा भट्ठा…
इन दोनों जगहों से जुड़े खर्चे…
शादी से पहले… मोइनुद्दीन भैया ने इस औरत पर किए…

लेकिन आज तक…
उसका कोई साफ हिसाब सामने नहीं आया…

सवाल सिर्फ इतना है —
वो पैसा गया कहाँ?

किस पर खर्च हुआ?
किसके लिए इस्तेमाल हुआ?

लेकिन अफ़सोस…
इन सवालों को पूछने की हिम्मत किसी ने नहीं दिखाई…

क्योंकि घर में “बड़ों” का नाम आ जाता है…
और उसी के सहारे… सच को दबा दिया जाता है।

उस औरत ने…
इस चुप्पी का पूरा फायदा उठाया…

और सिर्फ वही नहीं…
बल्कि उसने घर के “बड़े” होने के सहारे…
अपनी पकड़ और मजबूत कर ली…

चार भाई हैं घर में…
लेकिन कोशिश यही रही कि सब उसी के मुताबिक चलें…

हर फैसला… हर बात…
उसी से पूछकर हो…

लेकिन जो सबसे जरूरी बात थी —
वो आज तक अधूरी ही रही…

कि वो सारा पैसा… आखिर गया कहाँ?

सच तो ये है…
कि उस पैसे का इस्तेमाल उसने अपने मायके में…
अपने घर वालों की मदद के लिए किया…

कितनी मदद की…
कहाँ-कहाँ की…
इसका सही हिसाब… सिर्फ उसी को मालूम है।

और दुख की बात ये है…
कि जिसने खर्च किया…
वो अपने ही खून से बढ़कर…
किसी और के लिए खर्च करता रहा…

शायद उसे लगा…
कि यही सही है…
या शायद… वो सच देखना ही नहीं चाहता था।

इधर…
घर में एक और कहानी चल रही थी…

अब्बा ने खुला नया-भट्ठा (नया-भट्ठा/व्यवस्था) कर दिया…
लेकिन छह साल बीत गए…
और आज तक उसका कोई पूरा रिकॉर्ड नहीं मिला…

पैसा कहाँ गया…
कैसे खर्च हुआ…
किस पर खर्च हुआ…

कुछ भी साफ नहीं है…

ऊपर से…
अय्याशी के आरोप…
अपनी औरत को भी उसी रास्ते पर ले जाना…
और पैसे को गोल्ड में बदल देना…

जब कोई सवाल उठाने की कोशिश करे…
तो रोने का नाटक…

और जब बात थोड़ी गंभीर हो जाए…
तो “बड़प्पन” दिखाना…

लेकिन असली बड़प्पन क्या होता है?
क्या कभी किसी ने ये सोचा?

बड़प्पन ये नहीं कि गलती करके भी ऊँची आवाज़ में खड़े रहो…
बड़प्पन ये होता है कि अपनी गलती मानो…
और दूसरों का हक़ मत मारो…

लेकिन यहाँ तो उल्टा ही हुआ…

चारों भाइयों को…
अपने ही खून को…
ऐसे हालात में धकेला गया…
कि जैसे उनके हिस्से में सिर्फ दर्द आया हो…

माँ…
जो घर की नींव होती है…
उन्हें भी कई बार इस बदतमीज़ी का सामना करना पड़ा…

झगड़े हुए…
आँखों में आँसू आए…
और दिल में बोझ बढ़ता गया…

और सबसे बड़ा असर पड़ा…
अब्बा पर…

लगातार मानसिक दबाव…
बार-बार की कड़वी बातें…
दिल और दिमाग पर ऐसा असर डालती रहीं…

कि उनकी सेहत बिगड़ती चली गई…

मानसिक तनाव बढ़ा…
बीमारी बढ़ी…
डायबिटीज भी बढ़ गई…

यहाँ तक कि जब वो अस्पताल में थे…
तो वो औरत वहाँ तक नहीं गई…
या गई भी… तो सिर्फ दिखावे के लिए…

क्या यही रिश्ते होते हैं?
क्या यही इंसानियत है?

और अम्मा…
उनकी इद्दत के दौरान भी…
कई बार झगड़े किए गए…

सोचिए…
एक घर… जहाँ प्यार होना चाहिए…
वहाँ हर तरफ तनाव, शक और दर्द फैला हो…

तो वो घर नहीं रहता…
वो एक बोझ बन जाता है…

लेकिन…
हर अंधेरे के बाद एक सच्चाई जरूर सामने आती है…

और वो ये है —

सच चाहे जितना दबाया जाए…
एक दिन सामने जरूर आता है…

और जो लोग दूसरों का हक मारकर…
अपने लिए रास्ते बनाते हैं…
वो रास्ते ज्यादा दूर तक नहीं जाते।

क्योंकि…
हिसाब सिर्फ दुनिया में नहीं होता…
एक और जगह भी होता है…
जहाँ हर एक चीज़ का जवाब देना पड़ता है।

और वहाँ…
न कोई बहाना चलता है…
न कोई नाटक। 
..............
कभी-कभी बाहर से देखने वाले लोग सोचते हैं…
कि आखिर परिवार वाले, खानदान वाले कुछ कहते क्यों नहीं?
क्यों कोई खुलकर सच के साथ खड़ा नहीं होता?

ये सवाल बिल्कुल जायज़ है…
और दिमाग में आना भी चाहिए…

लेकिन असलियत अक्सर उतनी सीधी नहीं होती जितनी दिखाई देती है।

असल बात ये है कि…
जहाँ दौलत होती है…
वहीं झुकाव भी होने लगता है।

जिसके पास पैसा होता है…
जिसके पास देने की ताकत होती है…
अक्सर लोग उसी के करीब हो जाते हैं…

क्योंकि इंसान स्वभाव से वहीं जाता है…
जहाँ उसे फायदा नजर आता है।

अब अगर किसी के पास ज्यादा संपत्ति है…
वो किसी की मदद कर सकता है…
मुश्किल समय में सहारा दे सकता है…

तो जाहिर सी बात है —
रिश्तेदार भी उसी के साथ खड़े नजर आते हैं।

चाहे वो चाचा हों…
फूफा हों…
या उनके बच्चे…

हर कोई कहीं ना कहीं ये सोचता है —
कल को जरूरत पड़ी…
तो मदद कौन करेगा?

और उसी सोच के कारण…
सच होते हुए भी…
कई बार लोग खुलकर बोल नहीं पाते।

अगर झगड़ा हो जाए…
तो भी हल्का सा झुकाव उसी तरफ दिख जाता है…
जहाँ से भविष्य में फायदा मिलने की उम्मीद हो…

ये कड़वी सच्चाई है…
लेकिन हकीकत यही है।

दूसरी तरफ…
जब छोटे घर के लोग अपनी बात रखते हैं…
या अपने हक के लिए खड़े होते हैं…

तो अचानक “बड़प्पन” की बातें शुरू हो जाती हैं…

कहा जाता है —
“तुम्हारा बड़ा भाई है…”
“तुम्हें चुप रहना चाहिए…”
“रिश्ते निभाओ…”

लेकिन सवाल ये है —
क्या रिश्ते सिर्फ एक तरफ से निभाए जाते हैं?

क्या बड़प्पन सिर्फ छोटे लोगों को ही दिखाना होता है?

असल बड़प्पन तो ये होता है…
कि जो बड़ा है…
वो न्याय करे…
सबको बराबर समझे…
और गलत को गलत कहे…

लेकिन जब बड़प्पन सिर्फ नाम का रह जाए…
और न्याय पीछे छूट जाए…

तो रिश्ते कमजोर होने लगते हैं।

सच तो ये है —
रिश्ते मजबूरी से नहीं…
इंसाफ और इज्जत से चलते हैं।

जहाँ इंसाफ नहीं होता…
वहाँ दिलों में दूरी आ जाती है…

और जहाँ सिर्फ फायदा देखा जाता है…
वहाँ रिश्तों की असली कीमत खत्म हो जाती है।

इसलिए…
हर इंसान को ये समझना चाहिए —

सच के साथ खड़ा होना मुश्किल जरूर है…
लेकिन वही असली मजबूती है।

और जो लोग सिर्फ फायदे के लिए रिश्ते निभाते हैं…
वो वक्त आने पर…
कभी सच्चा साथ नहीं दे पाते।
.............................
कभी-कभी दिल में एक बहुत गहरा सवाल उठता है…
क्या सच में लोगों की आँखें बंद हो जाती हैं…
या वो जानबूझकर देखना नहीं चाहते?

जब एक ही परिवार में…
एक इंसान खंडहर जैसे हालात में रह रहा हो…
और दूसरा इंसान आराम, सुकून और अच्छे घर में जिंदगी बिता रहा हो…

तो क्या ये फर्क किसी को दिखाई नहीं देता?

छह साल…
पूरे छह साल गुजर गए…
एक इंसान उसी टूटी हुई हालत में जीता रहा…
ठंड, गर्मी, तकलीफ… सब सहता रहा…

लेकिन क्या किसी रिश्तेदार ने आकर पूछा —
“तुम कैसे हो?”
“तुम्हें किसी मदद की जरूरत है?”

नहीं…

किसी को कुछ नजर नहीं आया…

लेकिन जैसे ही कोई छोटी सी बात होती है…
जैसे ही कोई आवाज उठाता है…
तो वही रिश्तेदार अचानक सामने आ जाते हैं…

और कहते हैं —
“रिश्ते निभाओ…”
“बड़ों की इज्जत करो…”
“ऐसे बात नहीं करते…”

लेकिन सवाल ये है —
जब एक इंसान खामोशी से तकलीफ सह रहा था…
तब ये रिश्ते कहाँ थे?

तब क्यों किसी को बड़प्पन याद नहीं आया?

क्या बड़प्पन सिर्फ तब दिखाना होता है…
जब छोटा बोल दे?

क्या इंसाफ का मतलब सिर्फ एक तरफा होता है?

अगर ये “पर्सनल मैटर” है…
तो फिर बीच में आना क्यों?

और अगर बीच में आना है…
तो फिर इंसाफ के साथ आओ…

दोनों तरफ की बात सुनो…
दोनों के हालात समझो…
फिर फैसला करो…

सिर्फ एक तरफ झुकना…
और उसे ही सही मान लेना…
ये ना इंसाफ है… ना रिश्तेदारी।

सच तो ये है —
जहाँ फायदा दिखता है…
वहीं रिश्ते मजबूत नजर आते हैं…

और जहाँ तकलीफ होती है…
वहाँ लोग दूरी बना लेते हैं…

इसलिए…
या तो साफ कह दो —
“हम किसी का साथ नहीं देंगे…”

या अगर साथ देना है…
तो सच्चाई के साथ दो…
बराबरी के साथ दो…

अपने फायदे के हिसाब से रिश्ते निभाना…
ये रिश्ते नहीं होते…
ये सिर्फ मतलब होते हैं।

और याद रखो —
जो इंसान खामोशी से सब सहता है…
वो सब समझता भी है…

बस बोलता नहीं है…
....................
कभी-कभी दर्द सिर्फ गरीबी या तकलीफ से नहीं होता…
दर्द तब होता है… जब इंसान अपने ही हक से वंचित कर दिया जाता है।

सोचिए…
एक गाड़ी… जिसकी कीमत 20 लाख है…
और अगर सच्चाई से देखा जाए…
तो उसमें सिर्फ एक इंसान का नहीं…
चार भाइयों का हिस्सा है…

मतलब…
उस गाड़ी में हर एक का हक है…
हर एक का सम्मान जुड़ा हुआ है…

लेकिन जब वही गाड़ी…
दिखावे और अय्याशी का जरिया बन जाए…
तो बात सिर्फ पैसे की नहीं रहती…
दिल की हो जाती है।

एक दिन की बात है…
शादी का माहौल था…
खुशी का वक्त होना चाहिए था…

लेकिन वहीं…
एक ऐसा लम्हा आया…
जो दिल पर हमेशा के लिए निशान छोड़ गया…

गाड़ी खड़ी थी…
रिश्तेदार बैठे हुए थे…
चाचा भी उसी गाड़ी में बैठे थे…
और कई लोग आराम से सफर कर रहे थे…

लेकिन जब मैंने बैठने के लिए कहा…
तो साफ मना कर दिया गया —
“तुम इस गाड़ी पर नहीं जाओगे…”

सोचिए…
वो लफ्ज़ कितने भारी होते हैं…

एक तरफ अपने ही लोग…
दूसरी तरफ अपना ही हक…

लेकिन दोनों ही… उस पल छिन गए।

सब लोग देख रहे थे…
सबको समझ आ रहा था…

लेकिन किसी ने कुछ नहीं कहा…

क्यों?

क्योंकि सबको मजा आ रहा था?
या फिर… क्योंकि बोलने से उनका “फायदा” कम हो जाता?

असल बात यही है —
जहाँ स्वार्थ होता है…
वहाँ सच अक्सर चुप हो जाता है।

जिस गाड़ी में मेरा भी हिस्सा था…
जिसमें मेरा भी हक था…

उसी गाड़ी में…
मुझे बैठने का हक नहीं दिया गया…

और जिनका उस पर कोई हक नहीं था…
उन्हें बड़े आराम से बैठाया गया…

ये सिर्फ एक सीट का मामला नहीं था…
ये इज्ज़त का मामला था…
हक का मामला था…

और जब इंसान को उसके ही हक से दूर कर दिया जाए…
तो दिल के अंदर एक चुभन रह जाती है…

एक सवाल बार-बार उठता है —
क्या मैं इस घर का हिस्सा नहीं हूँ?

क्या मेरा हक सिर्फ कागजों तक सीमित है?
या फिर… वो भी नहीं?

सच तो ये है…
जिस इंसान को उसका हक नहीं मिलता…
उसका दर्द कोई समझ नहीं सकता…

और जो इंसान बिना हक के…
दिखावे के लिए सब कुछ इस्तेमाल करता है…

वो शायद ये भूल जाता है —
कि ये सब हमेशा नहीं चलेगा।

क्योंकि हक दबाया जा सकता है…
खत्म नहीं किया जा सकता।

और एक दिन…
जब वही दबा हुआ हक सामने आता है…
तो सिर्फ सवाल नहीं उठते…
हिसाब भी होता है।

और उस दिन…
ना कोई दिखावा काम आता है…
ना कोई बड़प्पन।

.....................
एक घर था…
उस घर में पाँच बच्चे थे…
और सच ये था कि पाँचों ही उस घर के बराबर के मालिक थे…

लेकिन वक्त के साथ…
बराबरी सिर्फ कागज़ों में रह गई…
ज़िंदगी में नहीं।

उन पाँचों में एक बड़ा बेटा था…
जिसके पास फैसले लेने की ताकत ज़्यादा हो गई थी…

उसका एक बेटा था…
और उसने अपने बेटे को एक बहुत अच्छे, मशहूर स्कूल में दाखिला दिलाया…

ये उसकी खुशी की बात थी…
एक बाप अपने बच्चे के लिए अच्छा चाहता है — ये गलत नहीं।

लेकिन कहानी यहीं से बदलती है…

उसी घर के बाकी चार भाइयों में से…
एक छोटा भाई भी था…
उसके दिल में भी वही ख्वाहिश थी…

वो भी उसी स्कूल में पढ़ना चाहता था…
जहाँ उसका भतीजा पढ़ रहा था…

क्योंकि वो जानता था —
अगर मौका मिले…
तो वो भी आगे बढ़ सकता है…

लेकिन…
जब उसने अपनी ये इच्छा जताई…

तो उसे साफ मना कर दिया गया…

कहा गया —
“इस स्कूल में मेरा बच्चा पढ़ता है…
तुम यहाँ नहीं पढ़ोगे…”

और सिर्फ इतना ही नहीं…
उस औरत ने भी यही बात दोहराई…

“यहाँ मेरा बच्चा पढ़ता है…
तुम्हें यहाँ पढ़ने की इजाज़त नहीं है…”

सोचिए…
ये शब्द सिर्फ मना करना नहीं थे…
ये एक हक को छीन लेना था…

जिस घर का वो बच्चा खुद मालिक था…
जिसका उस घर और उस साधन पर बराबर हक था…

उसे ही उसके हक से दूर कर दिया गया…

क्या उसे ये नहीं समझ आया…
कि जहाँ उसका अपना बच्चा पढ़ रहा है…
वहाँ वो छोटा भाई भी हक रखता है?

क्या मालिक होने का मतलब सिर्फ अपने बच्चों तक सीमित है?

या फिर…
मालिक होने का मतलब है —
सबको बराबर मौका देना?

असल बात ये है…
जब इंसान के अंदर अहंकार आ जाता है…
तो उसे ना इंसाफ दिखता है…
ना रिश्ते…

वो सिर्फ “मेरा” और “तेरा” में फर्क करने लगता है…

और वही फर्क…
एक दिन ज़ुल्म बन जाता है।

जिस बच्चे को पढ़ने से रोका गया…
उसके दिल पर क्या बीती होगी?

उसने क्या महसूस किया होगा?

शायद ये —
कि “मैं इस घर में होकर भी…
इस घर का नहीं हूँ…”

और ये एहसास…
किसी भी ज़ख्म से ज्यादा गहरा होता है।

सच तो यही है —
जहाँ हक छीन लिया जाए…
जहाँ बराबरी खत्म कर दी जाए…

वहाँ ज़ुल्म ही होता है।

और ज़ुल्म…
चाहे कितना भी छुपा लिया जाए…
एक दिन सामने जरूर आता है।
....................................................................................
उस घर की कहानी यहीं खत्म नहीं होती…
असल दर्द तो वहाँ से शुरू होता है…

जहाँ पाँचों भाई बराबर के हकदार थे…
वहीं एक बड़ा भाई…
और उसकी पत्नी…
धीरे-धीरे बाकी चारों भाइयों के लिए सबसे बड़ी परेशानी बन गए…

ये परेशानी सिर्फ एक-दो घटनाओं तक सीमित नहीं थी…
बल्कि रोज़मर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन चुकी थी…

हर फैसले में दखल देना…
हर बात में अपनी चलाना…
और अगर कोई अपनी बात रख दे…
तो उसे दबाने की कोशिश करना…

चारों भाइयों के लिए ये सिर्फ मुश्किल नहीं थी…
ये एक लगातार चलता हुआ मानसिक दबाव था…

कभी उनके हक पर रोक…
कभी उनकी जरूरतों को नजरअंदाज करना…
कभी उन्हें कमतर दिखाना…

और सबसे बड़ी बात —
उन्हें ये महसूस कराना कि
“तुम्हारी कोई अहमियत नहीं है…”

जबकि सच्चाई ये थी…
कि उस घर में हर भाई बराबर का मालिक था…
हर एक का हक बराबर था…

लेकिन व्यवहार ऐसा किया गया…
जैसे सब कुछ सिर्फ एक ही के इशारे पर चलता हो…

वो बड़ा भाई…
जिससे उम्मीद थी कि वो सबको साथ लेकर चलेगा…
सबको बराबर समझेगा…

वही अगर फर्क करने लगे…
तो घर का संतुलन टूट जाता है…

और जब उसकी पत्नी भी…
उसी रास्ते पर चलने लगे…
तो हालात और बिगड़ जाते हैं…

चारों भाई…
शायद चुप रहे…
शायद झगड़ा नहीं चाहते थे…
शायद रिश्तों को बचाना चाहते थे…

लेकिन चुप्पी का मतलब ये नहीं होता…
कि उन्हें दर्द नहीं हुआ…

असल में…
वो हर दिन थोड़ा-थोड़ा टूट रहे थे…

और यही सबसे खतरनाक होता है —
जब इंसान बाहर से शांत दिखे…
लेकिन अंदर से बिखर रहा हो…

सच तो ये है —
घर चलाना आसान है…
लेकिन इंसाफ के साथ घर चलाना…
सबसे मुश्किल काम होता है…

और जहाँ इंसाफ नहीं होता…
वहाँ धीरे-धीरे रिश्ते भी खत्म होने लगते हैं।

.....
जो कुछ बताया गया है…
वो पूरी कहानी नहीं है…
वो तो बस उस दर्द का एक छोटा सा हिस्सा है…

सच तो ये है…
कि दस साल की जिंदगी में जो कुछ गुज़रा है…
उसे शब्दों में पूरा बयान करना आसान नहीं…

क्योंकि कुछ जख्म ऐसे होते हैं…
जो दिखते नहीं…
लेकिन हर दिन महसूस होते हैं…

हर रोज़ की छोटी-छोटी बातें…
हर दिन का दबाव…
हर पल की तकलीफ…

ये सब मिलकर एक ऐसा बोझ बन जाते हैं…
जिसे उठाना हर किसी के बस की बात नहीं होती…

जो बाहर से सुनता है…
उसे लगता है — “बस इतनी सी बात है…”

लेकिन जो अंदर से जीता है…
वो जानता है —
कि ये “थोड़ा” नहीं…
बहुत ज्यादा होता है…

इतना ज्यादा…
कि अगर सब कुछ खुलकर बता दिया जाए…
तो सुनने वाले का दिल भी भारी हो जाए…

शायद…
उसका सुकून भी हिल जाए…

क्योंकि ये सिर्फ घटनाएँ नहीं हैं…
ये एक पूरी जिंदगी का संघर्ष है…

जहाँ हर दिन खुद को संभालना पड़ा…
हर बार खुद को मजबूत दिखाना पड़ा…

और सबसे बड़ी बात —
चुप रहकर सब सहना पड़ा…

लेकिन…
एक बात हमेशा याद रखनी चाहिए —

जो दर्द इंसान को तोड़ता है…
वही दर्द उसे मजबूत भी बनाता है…

और जो इंसान इतने सालों तक सब कुछ सहकर भी खड़ा है…
वो कमजोर नहीं हो सकता…

वो अंदर से बहुत मजबूत होता है…

बस…
उसकी कहानी कोई पूरी तरह सुन नहीं पाता।

...........................................................................
...................................................
इस पूरी कहानी का सबसे दर्दनाक हिस्सा सिर्फ बड़े लोगों के झगड़े नहीं हैं…
सबसे बड़ा असर उन बच्चों पर पड़ रहा है…
जो अभी अपनी जिंदगी बना रहे हैं…
जो पढ़ रहे हैं…
जो अपने भविष्य के सपने देख रहे हैं…

घर का माहौल…
जहाँ सुकून होना चाहिए…
वहाँ रोज़ का तनाव बन चुका है…

रोज़ की बहस…
रोज़ की खींचतान…
रोज़ की कड़वी बातें…

ये सब सिर्फ बड़े लोगों तक सीमित नहीं रहता…
ये बच्चों के दिल और दिमाग पर सीधा असर करता है…

एक बच्चा…
जो किताब खोलकर बैठता है…
उसे शांति चाहिए…
ध्यान चाहिए…
हौसला चाहिए…

लेकिन अगर उसके आस-पास रोज़ लड़ाई हो…
तो उसका ध्यान कहाँ लगेगा?

उसका मन कैसे पढ़ाई में लगेगा?

धीरे-धीरे…
उसकी पढ़ाई कमजोर होने लगती है…
उसका आत्मविश्वास टूटने लगता है…

और शायद यही वो बात है…
जो समझने की जरूरत है…

क्योंकि ऐसा लगता है कि…
कुछ लोगों का मकसद ही ये बन गया है —

कि जब तक बाकी बच्चों की पढ़ाई का समय है…
जब तक 10–15 साल का ये अहम दौर है…
तब तक माहौल को ऐसा बना दो…
कि उनका ध्यान भटक जाए…

उनकी शुरुआत कमजोर हो जाए…

और उसी बीच…
अपने बच्चों को आराम से आगे बढ़ा लो…

ये सोच…
सिर्फ गलत नहीं है…
ये खतरनाक है…

क्योंकि ये सिर्फ आज को नहीं…
पूरे भविष्य को प्रभावित करती है…

जिस बच्चे की शुरुआत टूट जाती है…
उसे संभलने में सालों लग जाते हैं…

और जो शुरुआत में मजबूत होता है…
वो आगे निकल जाता है…

अगर कोई जानबूझकर ऐसा माहौल बनाए…
जहाँ दूसरों के बच्चे पीछे रह जाएँ…
और अपने बच्चे आगे बढ़ जाएँ…

तो ये सिर्फ नाइंसाफी नहीं…
ये एक तरह का अन्याय है…

और इसके पीछे अगर घमंड हो…
“मेरे बच्चे पढ़ जाएंगे… बाकी की परवाह नहीं…”

तो ये घमंड…
एक दिन बहुत बड़ा सबक भी बनता है…

क्योंकि जिंदगी सिर्फ एक के लिए नहीं चलती…
जिंदगी सबको उसका समय देती है…

और जो दूसरों का रास्ता रोकता है…
वो खुद भी कभी ना कभी रुकता है…

सबसे जरूरी बात ये है —

बच्चे किसी भी घर का भविष्य होते हैं…
उनके साथ इंसाफ होना चाहिए…
उनके लिए माहौल साफ होना चाहिए…

क्योंकि अगर बचपन ही उलझनों में गुजर जाए…
तो जिंदगी का रास्ता भी कठिन हो जाता है।

और एक और गहरी बात…
जिसे अक्सर लोग नजरअंदाज कर देते हैं —

चाहे बच्चा घर पर पढ़े…
या 300 किलोमीटर दूर जाकर पढ़े…

घर का असर…
उसकी सोच पर हमेशा रहता है…

क्योंकि इंसान जहाँ से निकलता है…
वो माहौल उसके अंदर बस जाता है…

घर में अगर रोज़ तनाव हो…
झगड़े हों…
कड़वाहट हो…

तो बच्चे के दिमाग में भी वही असर पड़ता है…

उसकी सोच बदलने लगती है…
उसका ध्यान भटकता है…
उसका मन अशांत हो जाता है…

और फिर सवाल उठता है —
वो क्या सोचेगा?
कैसे पढ़ेगा?

क्योंकि “संगत” का असर बहुत गहरा होता है…

घर में क्या चल रहा है…
कैसा माहौल है…
कैसी बातें हो रही हैं…

ये सब बच्चे की सोच को बनाते भी हैं…
और बिगाड़ते भी हैं…

अगर घर ही परेशानियों से भरा हो…
तो बच्चे के अंदर भी बेचैनी आ जाती है…

और जब अंदर बेचैनी हो…
तो पढ़ाई में मन लगाना…
बहुत मुश्किल हो जाता है।

इसलिए…
बच्चों के लिए सबसे बड़ी जिम्मेदारी ये है —
उन्हें अच्छा माहौल दिया जाए…

क्योंकि वही माहौल…
उनका भविष्य तय करता है।
...............................
एक घर था…
जहाँ चार दीवारें तो मजबूत थीं, लेकिन रिश्ते धीरे-धीरे कमजोर हो रहे थे।

घर में दो भाई रहते थे—एक बड़ा, एक छोटा।
बड़ा भाई उम्र में तो बड़ा था, लेकिन उसके शब्द अक्सर छोटे पड़ जाते थे।
वह माँ से भी ऊँची आवाज़ में बात करता…
छोटे भाई को ताने मारता…
और उसकी पत्नी भी उसी लहज़े में बोलने लगी थी।

माँ चुप रहती…
क्योंकि उसे डर था कि कहीं घर और न टूट जाए।

छोटा भाई सब कुछ सहता रहा…
सोचता रहा—“शायद यही बड़प्पन है कि चुप रहा जाए।”

लेकिन एक दिन…
जब बात हद से गुजर गई…
और माँ की आँखों में आँसू आ गए…

तो छोटे भाई से रहा नहीं गया।

उसने पहली बार जवाब दिया…
उसी लहज़े में, उसी दर्द के साथ।

बस फिर क्या था…
घर में शोर मच गया—
“देखो! छोटा होकर जवाब दे रहा है… बड़ों की इज्जत नहीं करता!”

छोटा भाई कुछ पल चुप रहा…
फिर बोला—

“अगर बड़प्पन का मतलब सिर्फ उम्र है,
तो फिर इज्जत का मतलब सिर्फ चुप रहना क्यों है?”

“आप जिस भाषा में बात करेंगे,
वही भाषा आपको लौटकर मिलेगी।”

“अगर आप माँ से ऊँची आवाज़ में बोलेंगे,
तो क्या हमसे उम्मीद है कि हम फूलों की तरह जवाब दें?”

कमरे में सन्नाटा छा गया…

पहली बार किसी ने सच को आईने की तरह सामने रख दिया था।

बड़ा भाई कुछ नहीं बोला…
लेकिन उसके अंदर कुछ टूट चुका था—
शायद उसका अहंकार।

उस दिन के बाद…
घर में एक बदलाव आया।

धीरे-धीरे शब्द बदले…
लहज़ा बदला…
और फिर रिश्ते भी बदलने लगे।

क्योंकि उन्हें समझ आ गया था—
बड़प्पन हुकूमत से नहीं, इंसानियत से आता है।

Tuesday, 31 March 2026

झूठ के शहर में सच का मुसाफ़िर ,सीरत-ए-नबी ﷺ: सुकून का रास्ता,,,, दर्द से दरूद तक” — क्योंकि इसमें आपकी पूरी शायरी का सफ़र (दुनिया की सच्चाई → दर्द → रब और रसूल ﷺ की मोहब्बत) आ जाता है।

वह सारे लोग मेरी आँख में खटकते हैं,
जो लब पे शहद मगर बुग़्ज़ दिल में रखते हैं।

निशानियों में से उनकी निशानी ये भी है,
हर एक बात पर ये पीठ पीछे हँसते हैं।

तमाम खूबियाँ इनमें ही पाई जाती हैं,
ये नेक लोग हैं, सबको बुरा समझते हैं।

तमाम नुस्ख़ इन्हें दूसरों में दिखते हैं,
दिखाए आईना कोई तो ये गरजते हैं।

तुम ऐसे लोगों के मुँह न लगा करो 'शकील',
बीमार लोग हैं, खुद को ख़ुदा समझते हैं।

‘शकील’ सच की राह में चाहे अकेला ही सही,
झूठ के शहर में हम सर झुका के चलते नहीं।
 

ये दौर ऐसा है चेहरों पे नक़ाब रखते हैं,
अंदर से खोखले, बाहर से चमकते हैं।

जो सच की बात करे, उससे खफ़ा रहते हैं,
और झूठ बोलने वालों को सर पे रखते हैं।

‘शकील’ हम भी अब दुनिया को समझने लगे,
जो साथ चलते हैं अक्सर वही बदलते हैं।

भरोसा किस पे करें, ये भी समझ नहीं आता,
यहाँ तो अपने ही हर मोड़ पे छलते हैं।



नज़र मिलाते हैं लेकिन नज़र चुराते हैं,
ये लोग दिल में अलग, लब पे कुछ बताते हैं।

मुस्कुराहटों के पीछे दर्द छुपाते हैं,
जो सबसे ज़्यादा हँसते हैं, वही तन्हा रह जाते हैं।

किसी का हाल पूछना भी अब रिवाज़ सा है,
वरना अपने दर्द से लोग कहाँ जुड़ पाते हैं।

‘शकील’ दिल की सच्चाई संभाल कर रखना,
यहाँ तो सच्चे लोग ही सबसे ज़्यादा सताए जाते हैं।

हमने सीखा है ख़ामोशी में भी जी लेना,
क्योंकि हर ज़ख़्म यहाँ लफ़्ज़ों में नहीं बताए जाते हैं।



पहचान के काग़ज़ तो सबके पास होते हैं,
मगर असली चेहरे अक्सर छुपाए जाते हैं।

नाम, पता, नंबर से कौन किसी को समझ पाया,
यहाँ तो दिल के रिश्ते ही भुलाए जाते हैं।

‘शकील’ हम तो बस सच्चाई के सहारे जीते हैं,
वरना लोग तो हर मोड़ पे रंग बदलते जाते हैं।

भीड़ में रहकर भी तन्हा सा महसूस होता है,
जब अपने ही नज़रें चुरा के निकल जाते हैं।

जिसे अपना समझा, वही दर्द दे गया हमको,
अब तो हर रिश्ते में डर के साये नज़र आते हैं।

ये दुनिया काग़ज़ी पहचान पे यक़ीन करती है,
दिल के साफ़ लोग अक्सर ठुकराए जाते हैं। 

‘शकील’ अब तो दुआ है बस इतना सा रब से,
सच्चे लोग इस जहाँ में थोड़ा तो मुस्कुराते हैं।


जब टूट के बिखरते हैं, सब सहारे छूट जाते हैं,
तब ख़ुदा के दर पे ही आँसू सुकून पाते हैं। 🤲

जो दिल से याद करे अपने रब को तन्हाई में,
उसके अंधेरों में भी उजाले उतर आते हैं।

रसूल ﷺ की मुहब्बत दिल में जब उतर जाए,
बिगड़े हुए रास्ते भी खुद-ब-खुद सँवर जाते हैं। ❤️

उनकी सीरत को जो अपना आईना बना लेते हैं,
वो नफ़रतों के बीच भी मोहब्बत फैलाते हैं।

‘शकील’ बस यही दौलत काफ़ी है इस ज़िंदगी में,
जो दिल में इश्क़-ए-इलाही और नबी ﷺ बसाते हैं।

ना दौलत काम आती है, ना शोहरत साथ जाती है,
बस नेक अमल ही इंसान को ऊँचा उठाते हैं।



जब दिल पे ग़म का अँधेरा बहुत ही छा जाता है,
ख़ुदा का नाम ही सीने को रौशन कर जाता है।

जो टूट के भी सजदा-ए-रब में झुक जाते हैं,
वही लोग हर इम्तिहान में कामयाब कहलाते हैं। 

रात की तन्हाई में जो आँसू बहाते हैं,
वो ही सुबह सुकून का पैग़ाम पाते हैं।

रसूल ﷺ की सीरत को जो दिल में उतार लेते हैं,
वो नफ़रतों के दरिया में भी मोहब्बत बहाते हैं। 

जो नाम-ए-मुस्तफ़ा ﷺ से अपने दिल को सजाते हैं,
उनके हर दर्द पे रहमत के फूल बरसते जाते हैं।

गुनाहों में घिर कर भी जो तौबा कर लेते हैं,
ख़ुदा के दर से वो खाली कभी नहीं जाते हैं।

‘शकील’ ये दुनिया चाहे जितना भी आज़माती रहे,
रब वाले हर हाल में मुस्कुराते ही जाते हैं।

जिस दिल में इश्क़-ए-नबी ﷺ की शमा जलती है,
वहाँ अँधेरे भी आकर खुद ही लौट जाते हैं। ✨

ना ताज चाहिए, ना कोई बड़ी पहचान हमें,
बस उनके उम्मती हैं, यही फख्र दिलाते हैं।

‘शकील’ जब-जब दिल टूट कर बिखर जाता है,
दरूद पढ़ते ही दिल फिर से सँवर जाते हैं। 


जिन्होंने पत्थरों में भी दुआएँ ही उठाईं,
वही रहमत बनके हर दिल पे उतर आते हैं। 

ताइफ़ की गलियों में लहू बहता रहा मगर,
लब पे फिर भी उनकी बस दुआएँ ही आते हैं। 

जो दुश्मनों को भी माफ़ कर देना सिखाते हैं,
वही तो असल में नबी कहलाते हैं।

भूखे रहकर भी जो औरों को खिलाते रहे,
ऐसे सादगी के सितारे कहाँ मिल पाते हैं। 

‘शकील’ सीरत-ए-नबी ﷺ को जो दिल में बसा ले,
उसके हर अंदाज़ में करम नज़र आते हैं।


अंधेरों में भी जिसने उजालों का सबक दिया,
वो नाम-ए-मुस्तफ़ा ﷺ दिल को रोशन कर जाते हैं। 

जिसने बदले में पत्थर नहीं, मोहब्बत दी,
ऐसे किरदार पे फ़रिश्ते भी नाज़ करते हैं।

ज़ुल्म सहकर भी जिसने सब्र का रास्ता चुना,
वो ही उम्मत को जीने का हुनर सिखाते हैं।

‘शकील’ जब भी सीरत को पढ़ते हैं आँख भर आती है,
क्योंकि उसमें दर्द भी हैं और मरहम भी मिल जाते हैं।


ना ताज, ना तख़्त, ना कोई दुनिया की चाहत थी,
उनकी सादगी पे आज भी दिल झुक जाते हैं।

जिसने हर रिश्ते को इंसानियत से जोड़ा,
वो ही तो रहमत बनकर जहाँ में आते हैं।

दरूद की सदा जब लबों पे सज जाती है,
तो ग़म के बादल भी खुद-ब-खुद हट जाते हैं। 


‘शकील’ बस यही राह-ए-नजात है इस जहाँ में,
जो नबी ﷺ के नक़्श-ए-कदम पे चल जाते हैं।

Thursday, 26 February 2026

Auraton ke Masail par Mashhoor Kitabein (Urdu/Hindi)

Jannati Zewar (جنتی زیور):
Writer: Allama Abdul Mustafa Azmi

Aurton Ke Masaa'il (عورتوں کے مسائل):
Writer: Siddiq Ahmad Attari

Khutbat e Khawateen (خطباتِ خواتین):
Writer: Maulana Syed Mohammad Quraish / Mufti Mohammad Yahya Qasmi


Tuhfa-e-Khawateen (تحفہ خواتین):
Writer: Islamic Guidance for Women

Auraton Ke Jadid or Aham Masail (عورتوں کے جدید مسائل):
Writer: Md. Amir Hussain Amjadi

Auratun ke imtiyaazi Masail (عورتوں کے امتیازی مسائل):
Writer: Hafiz Salahuddin Yusuf


Auraton ke Huqooq aur Seerat par Kitabein
1. Maulana Ilyas Attar Qadri (DawateIslami) 
Aurat Ka Intikhab (عورت کا انتخاب): Aurat ke darja aur uske huqooq par roshni dalti hai.
Parda (پردہ): Shari'at mein parde ki ahmiyat aur aurat ki hifazat par likhi gayi hai.
Bibi Fatima ki 12 Hikayat (بی بی فاطمہ کی 12 حکایات): Seerat par mabni kitab. 
2. Mufti Abdul Wahab (Barelvi/Sunni) 
Islam Main Aurat Ke Huqooq (اسلام میں عورت کے حقوق): Ye kitaab Islam mein aurat ki izzat, virasat aur samaji huqooq ko bayan karti hai.



3. Maulana Abdul Habib Attari (DawateIslami) 

Islam Se Pehle Aurat Ki Halat (اسلام سے پہلے عورت کی حالت): Is mein aurat ki tarikh aur Islam ke baad uski behtari par baat ki gayi hai.



4. Maulana Tatheer Ahmed Razvi Barelvi 
Aao Deen Pr Chale (آؤ دین پر چلیں): Is mein deeni ta'aleemat ke sath auraton ke liye shar'i masail aur adab ka zikr hai. 

5. Allama Hasnain Raza Barelvi 
Seerat e Aala Hazrat (سیرت اعلیٰ حضرت): Agarche ye seerat-e-raza hai, par is mein unke khandaan ki khawateen ke huqooq aur unke muamlaat ka zikr milta ha

6. Digar Barelvi Ulema (Books on Niya-Biwi ke Huqooq) 
Biwi or Shohar ke Huqooq (بیوی اور شوہر کے حقوق): Ye kitabein aksar Barelvi publisher (jaise Maktaba-tul-Madina) se milti hain jo aurat ke huqooq-o-faraiz samjhate hain.
Miya Biwi Ke Huqooq (میاں بیوی کے حقوق): Allama Alam Faqri ki likhi hui kitab. 

Auraton ki Seerat par Khususi Kitabein:
Sahabiyat-e-Rasool (صحابیاتِ رسول): Sahaba karam ki khawateen ki zindagi par likhi gayi kitabein jo Barelvi madaris mein padhai jati hain.
Bibi Ayesha ki Seerat (بی بی عائشہ کی سیرت): Hazrat Ayesha (R.A) ki zindagi aur unke ilm par mabni. 
Ye kitabein aksar Maktaba-tul-Madina ya Razavi Kitab Ghar se hasil ki ja sakti hain.



सहाबियात-ए-मुबारका (Sahabiyat-e-Mubaraka)
लेखक: अल्लामा सैयद रज़ा अली बरेलवी


औरत का इस्लामिक किरदार (Aurat ka Islamic Kirdar)
लेखक: मुफ्ती जलालुद्दीन अहमद अमजदी

Shadi Mubarak (Mia Biwi Ke Darmiyan Jaiz aur Najaiz Kaam): Maulana Shaheed Barelvi (ye kitab Barelvi maktab-e-fikr ke nazaryat ke mutabiq shadi aur aurat ke huqooq par hai).
Seerat-e-Sahabiyat (The Biographies of Female Companions of the Prophet), authored by Maulana Saeed Ansari Nadvi and Maulana Abdus Salam Nadvi. 

Tuesday, 17 February 2026

बरेलवी तहरीक (Ahl-e-Sunnat wa Jamaat) – एक मुख़्तसर मगर गहरी झलक

बरेलवी क्या है? (सादा अल्फ़ाज़ में समझें)

बरेलवी तहरीक असल में सुन्नी इस्लाम की एक इस्लाही (reform) और रूहानी तहरीक है, जो हज़रत मुहम्मद ﷺ की सुन्नत, चारों फ़िक्ही मज़ाहिब (ख़ास तौर पर हनफ़ी), और सूफ़िया की तालीमात को मज़बूती से पकड़ने पर ज़ोर देती है।
इसका नाम उत्तर प्रदेश के शहर बरेली से जुड़ा है, जहाँ के बड़े आलिम Ahmed Raza Khan Barelvi ने 19वीं–20वीं सदी में इसकी बुनियाद मज़बूत की।

बरेलवी उलमा अपने आपको Ahl-e-Sunnat wa Jamaat कहते हैं—यानि वो जमाअत जो नबी ﷺ की सुन्नत और उम्मत की इत्तेहाद (unity) पर क़ायम रहे।
Bareilly उत्तर प्रदेश का एक पुराना शहर है, जो इल्म-ओ-अदब और सूफ़ियाना माहौल के लिए जाना जाता है।
यहीं Ahmed Raza Khan Barelvi का मदरसा Manzar-e-Islam क़ायम हुआ, जहाँ से बरेलवी तहरीक ने तालीमी और फिक्री शक्ल इख़्तियार की।

अहमद रज़ा ख़ान ने Fatawa-e-Razawiyya जैसी बड़ी किताब लिखी, जिसमें उन्होंने:

नबी ﷺ की शान-ओ-मक़ाम पर ज़ोर दिया

सूफ़ियाना अमल (औलिया की मोहब्बत, उर्स, मिलाद) की हिमायत की

अशअरी/मातुरीदी अकीदे और हनफ़ी फ़िक्ह की ताईद की
इल्मी असास (बुनियादी फ़िक्र)

बरेलवी तहरीक इन उसूलों पर क़ायम है:

📖 क़ुरआन और हदीस की पैरवी

🕌 चारों सुन्नी मज़ाहिब (हनफ़ी, शाफ़ई, मालिकी, हंबली) की एहतिराम

🧠 इल्म-उल-कलाम (अशअरी, मातुरीदी)

🌿 सूफ़ी सिलसिले – क़ादिरी, चिश्ती, नक़्शबंदी, सुहरवर्दी

❤️ औलिया-ए-किराम से मोहब्बत और तवस्सुल
बरेलवी तहरीक कोई नया मज़हब नहीं, बल्कि सुन्नी इस्लाम की पारंपरिक रूहानी तज्दीद (revival) है।

इसका मरकज़ी ख़याल नबी ﷺ की शान, सुन्नत की पैरवी, और सूफ़ियाना मोहब्बत है।

अहमद रज़ा ख़ान बरेलवी ने इसे इल्मी और फिक्री शक्ल दी।

मदरसों के ज़रिये यह तहरीक आज भी दीऩी तालीम, फ़तवा और दावत का काम कर रही है।
2000 के आस-पास तख़मीना लगाया गया कि तक़रीबन 20 करोड़ से ज़्यादा अफ़राद इस फिक्री रवायत से जुड़े हुए हैं, ज़्यादातर हिंदुस्तान और पाकिस्तान में, लेकिन ब्रिटेन, अफ्रीका, बांग्लादेश, श्रीलंका और अमरीका तक इसका असर है।



बरेलवी तहरीक असल में सुन्नी इस्लाम की एक तहरीक है, जो अपने आपको Ahl-e-Sunnat wa Jama'at यानी “रसूल ﷺ की सुन्नत और जमाअत के रास्ते” का पैरोकार कहती है। ये लोग फिक़्ह में ज़्यादातर हनफ़ी और कहीं-कहीं शाफ़ई मस्लक पर चलते हैं, अकीदे में मातुरीदी और अशअरी उसूल मानते हैं, और तसव्वुफ़ में क़ादिरी, चिश्ती, नक्शबंदी, सुहरवर्दी सिलसिलों से ताल्लुक रखते हैं।
इस तहरीक का बड़ा मक़सद ये रहा कि मुसलमानों को फिर से सुन्नत और शरीअत की तरफ़ लाया जाए, और रसूल ﷺ की सीरत से मुहब्बत व अदब को ज़िंदा रखा जाए।

बरेलवी तहरीक के बुनियादी उसूल

फ़िक़्ह में – ज़्यादातर लोग हनफ़ी मस्लक को मानते हैं।

अक़ीदा में – मातुरीदी या अशअरी तरीक़ा।

तसव्वुफ़ (सूफियत) – क़ादरी, चिश्ती, नक्शबंदी, सुहरवर्दी सिलसिलों से लगाव।

नबी ﷺ की मोहब्बत और अदब – मिलाद, नात, दरूद, और औलिया की ताज़ीम पर ज़ोर।

अपने आपको सुन्नी इस्लाम की पुरानी रवायत का सिलसिला मानते हैं।

फैलाव
ये तहरीक हिंदुस्तान, पाकिस्तान, बांग्लादेश, अफ़ग़ानिस्तान, श्रीलंका, यूके, साउथ अफ्रीका और अमेरिका तक फैली हुई है।
2000 के आस-पास इसके तक़रीबन 20 करोड़ से ज़्यादा मानने वाले बताए जाते हैं, ज़्यादातर दक्षिण एशिया में।


तमाम मदारिस/जामिआत के सिर्फ़ नाम पेश किए जा रहे हैं:

Al Jamiatul Ashrafia

Jamia Al-Karam

Al Madeena Islamic Complex

Al-Jame-atul-Islamia

Aleemiyah Institute of Islamic Studies

Ashraf ul Madaris

Dar-ul-Madinah

Darul Huda Islamic University

Darul Uloom Pretoria

Jamia Ahmadiyya Sunnia Kamil Madrasa

Jamia Amjadia Razvia

Jamia Naeemia Lahore

Jamia Naeemia Moradabad

Jamia Nizamia

Jamia Nizamia Ghousia

Jamia Nusrathul Islam

Jamia Uloom-i-Sharia

Jamia-tul-Madina

Jamiatur Raza

Jamia Qadria Rizvia

Jamia Nizamia Rizvia

Jamia Faridia

Jamia Rizvia Zia Ul Uloom

Jamia Aminia Rizvia

Markaz-E-Mustafa

Madarganj Abdul Ali Mirza Kasem Kamil Madrasah

Manzar-e-Islam

Minhaj-ul-Quran International

Tanzeem ul Madaris Ahle Sunnat

Faizan E Madina




देखिए, हर मस्लक अपने आपको कुरआन-सुन्नत का सही समझने वाला बताता है।
बरेलवी तहरीक का ज़ोर नबी ﷺ की मोहब्बत, औलिया से लगाव, और सुन्नी परंपरा की हिफ़ाज़त पर है।

Friday, 30 January 2026

farewell day 2025 -26

मतला:
सितारे बनें हम, ताले न टूटें कभी,
(रदीफ़: कभी)
गाँव के बच्चों की तालीम हो रोशन और सच्ची कभी।

पहला शेर:
2017 से जो मैंने दिया तालीम का दफ़्तर,
गाँव की गलियों में गूँजे वही इल्म कभी।

दूसरा शेर:
लड़कियाँ पहली बार मैथ्स में आईं बराबरी की राह,
Equal Numbers, Infinite Memories, बन जाए माह कभी।

तीसरा शेर:
मार भी सीख है, लोहार लोहे पर चलता है,
पत्थर भी तरसे, तब ही मूर्तियाँ बनती हैं वाह कभी।

चौथा शेर:
अलीगढ़ से जो आया, दिया समय बच्चों को,
पैसा नहीं, कोशिश थी, हर दिल को मिली सच्चाई कभी।

पाँचवाँ शेर:
गाँव बदलता है सिर्फ़ तब, जब पढ़ें ज़्यादा,
ज्ञान की रोशनी से मिटे अज्ञान की घटाएँ कभी।

छठा शेर:
याद रहेंगे टीचर, जो सही और जो गलत सिखाए,
जिंदगी में आगे बढ़ते रहो, फर्क साफ़ दिखाई कभी।

मक़्ता (तख़ल्लुस – आपकी पहचान):
— तख़ल्लुस: “Shakil”
शक़ील कहता है, पढ़ाई और मेहनत ही मंज़िल है,
गाँव की गलियों में हर बच्चा रोशन बनाई कभी।

जहाँ बेटियाँ मैथ्स में आगे बढ़ीं, वहाँ बराबरी का दिया जलाया,
इन अनगिनत यादों में हर कदम, मेरा जज़्बात समाया।



अगले शेर

जहाँ बेटियाँ मैथ्स में आगे बढ़ीं, वहाँ बराबरी का दिया जलाया,
इन अनगिनत यादों में हर कदम, मेरा जज़्बात समाया।

शेर

लोहार लोहे पर वार करता है, मूरत वहीं बनती है,
पाठशाला की डगर में जो चोट लगी, वही सीख की असली तालीम है।

शेर

कई हंसी-मज़ाक, कई खेल, मैंने बच्चों को कराया,
ताकि जब कदम बाहर बढ़ें, तो हर भाषण में दम दिखाया।

शेर

गाँव की मिट्टी में बस पढ़ाई की खुशबू फैलाना,
हर घर से निकले सितारे, हर आँख में तालीम का नूर दिखाना।

शेर

जो सही सिखाया, वही साथ निभाया,
जो गलत राह दिखाई, समय ने उसका हिसाब चुकाया।

शेर

आलीगढ़ से मैं आता हूँ, अपना वक़्त देने,
क्योंकि दौलत नहीं, बल्कि ज्ञान ही बच्चों का खजाना बने।

मक़्ता (अंतिम शेर, तख़ल्लुस के साथ)

बराबरी, तालीम, बेटियाँ और सपने मेरी शायरी का हिस्सा हैं,
फ़ज़ील कहता है: पढ़ाई से ही गाँव और दुनिया का उजाला लिखा है


तख़ल्लुस: फ़ज़ील

मतला (पहली शेर, दोनों मिसरे क़ाफ़िया और रदीफ़ के साथ)

2017 से मैं पढ़ा रहा हूँ, बच्चों की दुनिया सँवारा,
हर गाँव के चेहरों में उजाला, हर दिल में ख़्वाब हमारा।


अगले शेर

जहाँ बेटियाँ मैथ्स में आगे बढ़ीं, वहाँ बराबरी का दिया जलाया,
इन अनगिनत यादों में हर कदम, मेरा जज़्बात समाया।


शेर

लोहार लोहे पर वार करता है, मूरत वहीं बनती है,
पाठशाला की डगर में जो चोट लगी, वही सीख की असली तालीम है।


शेर

कई हंसी-मज़ाक, कई खेल, मैंने बच्चों को कराया,
ताकि जब कदम बाहर बढ़ें, तो हर भाषण में दम दिखाया।


शेर

गाँव की मिट्टी में बस पढ़ाई की खुशबू फैलाना,
हर घर से निकले सितारे, हर आँख में तालीम का नूर दिखाना।


शेर

जो सही सिखाया, वही साथ निभाया,
जो गलत राह दिखाई, समय ने उसका हिसाब चुकाया।


शेर

आलीगढ़ से मैं आता हूँ, अपना वक़्त देने,
क्योंकि दौलत नहीं, बल्कि ज्ञान ही बच्चों का खजाना बने।


मक़्ता (अंतिम शेर, तख़ल्लुस के साथ)

बराबरी, तालीम, बेटियाँ और सपने मेरी शायरी का हिस्सा हैं,
फ़ज़ील कहता है: पढ़ाई से ही गाँव और दुनिया का उजाला लिखा है।


खास बातें इस ग़ज़ल की:

  1. रदीफ़ और क़ाफ़िया: “हमारा / समाया / जलाया / दिखाया / लिखा है”

  2. मतला: पहली शेर ने पूरी थीम सेट कर दी

  3. मक़्ता: फ़ज़ील का नाम, आपकी पहचान

  4. जज़्बात और कल्पना: बच्चों की दुनिया, तालीम की चमक, गाँव का उजाला

  5. थीम: Equal Numbers, Infinite Memories / बराबरी, बेटियाँ, मैथ्स


Tuesday, 13 January 2026

इंसान क्या-क्या नहीं करता, बस ज़िंदा रहने के लिए,माल का कटरा जोड़ता है, उम्र भर मरने के लिए।

इंसान क्या-क्या नहीं करता, बस ज़िंदा रहने के लिए,
माल का कटरा जोड़ता है, उम्र भर मरने के लिए।

सुबह से शाम, शाम से रात,
रोटी की ख़ातिर भागता है,
कभी सच बेच देता है,
कभी ज़मीर को ही काटता है।

दौलत की दौड़ में ऐसा उलझा,
कि सुकून पीछे छूट गया,
दो वक़्त के खाने की फ़िक्र में,
ज़िंदगी जीना ही भूल गया।

कभी धूप में जला,
कभी छाँव को तरसा,
इस कमाने की आग में,
अपनों से भी बरसों बरसा।

मगर जब सांसें थक जाती हैं,
और रूह पिंजरे से उड़ जाती है,
ना माल साथ जाता है,
ना शान, ना सूरत जाती है।

बस रह जाती हैं यादें,
कुछ अच्छे कामों के निशान,
जिसने दिलों को जोड़ा हो,
वही कहलाता है इंसान।

कब्र की तन्हाई लंबी है,
कयामत तक का इंतज़ार,
वहाँ ना सिक्का काम आएगा,
ना रिश्ते, ना कारोबार।

वहाँ पूछेगा बस अमल तेरा,
क्या बोया था, क्या काटा,
किसका आंसू पोंछा तूने,
किसका दिल तूने बाँटा।

तो ऐ बंदे! अभी भी वक़्त है,
इस दौड़ को थोड़ा थाम ले,
दुनिया की ज़रूरत पूरी कर,
मगर आख़िरत भी संभाल ले।

ऐसा कुछ कर जा इस सफ़र में,
कि जाने के बाद भी नाम रहे,
मिट्टी ओढ़ ले जब जिस्म तेरा,
तो दुआओं में तेरा काम रहे।


“इंसान क्या-क्या नहीं करता दो वक़्त की रोटी के लिए,”

मतलब:
इंसान अपनी ज़िंदगी चलाने के लिए, सिर्फ़ पेट भरने के लिए, हर तरह की मेहनत, परेशानी और संघर्ष करता है।
यह लाइन बताती है कि रोज़ी की मजबूरी इंसान से बहुत कुछ करवा देती है।



“कभी ज़मीर बेच आता है, कभी ख़ुद को तोड़ देता है रोज़ी के लिए।”

मतलब:
कुछ लोग पेट की मजबूरी में गलत काम भी कर बैठते हैं,
अपना ईमान, अपने उसूल, अपनी इज़्ज़त तक कुर्बान कर देते हैं।
यह लाइन चेतावनी है कि रोज़ी के चक्कर में इंसान अपना जमीर न खो दे।



“दौलत की तलाश में शहर-दर-शहर भटकता है,”

मतलब:
इंसान पैसा कमाने के लिए अपने घर, अपने गाँव, अपने अपनों से दूर चला जाता है।
ज़िंदगी की असली जड़ें पीछे छूट जाती हैं।



“सुकून घर में रह जाता है, इंसान बाहर निकल जाता है।”

मतलब:
असल शांति घर और रिश्तों में होती है,
लेकिन इंसान उसे वहीं छोड़कर दौलत के पीछे भागता है।
यह लाइन सिखाती है कि सुकून बाहर नहीं, अंदर होता है।



“सुबह से शाम तक बस कमाने की फ़िक्र में रहता है,”

मतलब:
इंसान दिन-रात सिर्फ़ पैसा कमाने के बारे में सोचता रहता है,
उसके पास अपने लिए, अपने परिवार के लिए वक़्त नहीं बचता।

“ये भूल जाता है कि ज़िंदगी भी कोई चीज़ होती है।”

मतलब:
पैसे की दौड़ में इंसान यह भूल जाता है कि
हँसना, सुकून, रिश्ते, सेहत — ये भी ज़िंदगी का हिस्सा हैं।



“अच्छे-बुरे हर रास्ते से गुज़रता चला जाता है,”

मतलब:
कुछ लोग सही-गलत की पहचान छोड़ देते हैं,
बस मंज़िल (पैसा) दिखती है, रास्ता नहीं।



“बस पेट की आग है जो हर गुनाह को जायज़ बनाता है।”

मतलब:
भूख और लालच इंसान को यह बहाना दे देते हैं कि
“मजबूरी थी”, और वह गुनाह को भी सही समझने लगता है।


“मगर जब साँसों की डोरी अचानक टूट जाती है,”

मतलब:
मौत बिना बताए आ जाती है,
न उम्र पूछती है, न हालात।



“ना माल साथ जाता है, ना ही तिजोरी जाती है।”

मतलब:
मरने के बाद इंसान के साथ कोई पैसा, सोना, दौलत नहीं जाती।
सब यहीं रह जाता है



“रह जाती हैं तो बस यादें और किए हुए काम,”

मतलब:
इंसान के पीछे सिर्फ़ उसके कर्म और लोगों की यादें बचती हैं।


“कोई दुआ देता है, कोई करता है बदनाम।”

मतलब:
अगर इंसान अच्छा रहा, तो लोग दुआ देते हैं,
और अगर बुरा रहा, तो नाम भी खराब छोड़ जाता है।



“जिसने इंसानियत बोई, वो दिलों में ज़िंदा रहा,”

मतलब:
जो दूसरों के काम आया, मददगार रहा,
वह मरने के बाद भी लोगों के दिलों में ज़िंदा रहता है।


“जिसने सिर्फ़ दौलत जोड़ी, वो क़ब्र में तन्हा रहा।”

मतलब:
सिर्फ़ पैसा कमाने वाला इंसान,
आख़िर में अकेला रह जाता है, न इज़्ज़त, न दुआ।


“क़ब्र की तन्हाई में न पैसा काम आएगा,”

मतलब:
मौत के बाद न बैंक बैलेंस काम आता है,
न रिश्तेदारों की ताक़त।




“वहाँ तो बस तेरा अमल ही तेरे साथ जाएगा।”

मतलब:
अल्लाह के सामने सिर्फ़ अच्छे-बुरे काम देखे जाएंगे।



“क़यामत तक की नींद है, लंबा है वो सफ़र,”

मतलब:
क़ब्र की ज़िंदगी लंबी है,
इसलिए इसकी तैयारी ज़रूरी है।



“ख़ुदा जाने कैसा होगा वहाँ का मंज़र।”

मतलब:
वहाँ का हाल सिर्फ़ अल्लाह जानता है,
इसलिए इंसान को डर और उम्मीद दोनों में रहना चाहिए।



“इसलिए ऐ इंसान, अभी होश में आ जा,”

मतलब:
यह लाइन नसीहत है —
अब भी वक़्त है, सुधर जाओ।



“जो वक़्त मिला है, उसे नेकियों में लगा जा।”

मतलब:
ज़िंदगी का सही इस्तेमाल अच्छे कामों में करना चाहिए।



“इतना कमा कि ज़रूरत पूरी हो जाए,”

मतलब:
दौलत उतनी ही ठीक है जो ज़रूरत पूरी करे,
लालच नुकसान देता है।



“इतना अच्छा कर कि रूह भी मुस्कुरा जाए।”

मतलब:
इतने नेक काम करो कि दिल और रूह को सुकून मिले।

Friday, 2 January 2026

अगर आपकी बेटी अपने फोन पर अपने किसी पुरुष टीचर (Male Teacher) से रोज़ाना या हफ्ते में बात कर रही है, तो उस पर नज़र रखना शुरू करें और टीचर को तुरंत ब्लॉक करवाएं!

अगर आपकी बेटी अपने फोन पर अपने किसी पुरुष टीचर (Male Teacher) से रोज़ाना या हफ्ते में बात कर रही है, तो उस पर नज़र रखना शुरू करें और टीचर को तुरंत ब्लॉक करवाएं!
एक टीचर के लिए किसी स्टूडेंट को 'इम्प्रेस' (प्रभावित) करना सबसे आसान काम होता है। अगर ये कम उम्र की बच्चियां हों, तो यह काम और भी आसान हो जाता है। मोबाइल फोन आने के बाद से कम उम्र की बच्चियां उनका आसान शिकार बन चुकी हैं। ये लोग आसान शिकार की तलाश में बच्चियों से संपर्क बढ़ाने या दोस्ती करने में जरा भी नहीं हिचकिचाते, हालांकि उनकी खुद की बेटियों की उम्र भी इन बच्चियों जितनी ही होती है...
और मुझे शर्म आती है कि मैं ऐसी बात कर रहा हूं, लेकिन हमारे यहां पुरुष टीचर्स की एक बड़ी संख्या है; कुछ टीचर्स अपनी फीमेल स्टूडेंट्स को एक आसान शिकार समझकर उन्हें फंसाने के चक्कर में रहते हैं। ऐसे कई मामले मैं अपनी आंखों के सामने देख चुका हूं। इस्लामियात (धार्मिक शिक्षा) का टीचर हो, नैतिकता का, बायो का या फिजिक्स का... आप विषय का नाम लें, मैं बता दूंगा कि फलां जगह फलां टीचर को अपनी छात्रा से शारीरिक फायदे (गलत इरादे) की खातिर रिश्ता बनाते हुए देखा है...
सबसे दुख की बात तो यह है कि ये लोग अपनी हरकत पर शर्मिंदा तक नहीं होते और पकड़े जाने पर बेशर्मी से कहते हैं कि कसूर बच्ची का है, उनका नहीं। और उनके साथ काम करने वाले (Colleagues) भी कोई कार्रवाई नहीं करवाते, क्योंकि डर होता है कि बाद में उनकी पोल भी वो शख्स खोल सकता है। बेशर्मी की इस कैटेगरी में उम्र का भी कोई लिहाज नहीं है; सत्तर साल के धार्मिक टीचर से लेकर 20-30 साल के मॉडर्न युवा टीचर तक, सब के सब इस मामले में एक जैसे ही नज़र आते हैं।
इसलिए, अगर आप अपनी बच्ची के मुंह से किसी पुरुष टीचर की ज़रूरत से ज़्यादा तारीफ सुन रहे हैं, बच्ची हर रोज़ और हर वक़्त उसी की तारीफ करती है, उस टीचर की तरफ से आपकी बच्ची पर अहसान भी किए जा रहे हैं और मोबाइल से बातचीत भी हो रही है, तो आसानी से समझ जाएं कि वह टीचर किस 'शिकार' की तलाश में हो सकता है। हमारे समाज का यह शर्मनाक पहलू जिस दिन मैंने देखा था, मुझे बेहद अफ़सोस हुआ, मगर यह एक कड़वी सच्चाई है। यहां तक कि साथ वाले टीचर्स भी जानते हैं कि किस घटिया आदमी की नज़र आजकल किस स्टूडेंट पर है और वह उसे ऑफिस में कब बुला रहा है। हमारे यहां इस टॉपिक पर बात करना मना (Taboo) समझा जाता है और माएं बच्चियों को नहीं बतातीं कि कौन सी हरकत गंदी हो सकती है और कैसे सामने वाले को अपनी हद (Limit) में रखना चाहिए। मगर ये बातें बच्चियों को समझाना बहुत ज़रूरी है, इससे पहले कि वो किसी का शिकार बनें।
माफ़ी चाहता हूं, प्लीज माफ़ कर देना!
इस लेख में किसी एक व्यक्ति को निशाना नहीं बनाया गया है, बल्कि हमारे समाज में होने वाली गलतियों की तरफ इशारा किया गया है।
शुक्रिया... खुश रहें, खुशियां बांटें, अपना और अपनों का ख्याल रखें।
(

Monday, 1 December 2025

Abid Hasan Safrani (Zain-ul-Abdin Hasan) Biography

अबिद हसन सफ़रानी (IFS)
इनका असली नाम ज़ैन-उल-आबिदीन हसन था। ये हिंदुस्तानी आज़ादी की जंग में इंडियन नेशनल आर्मी (INA) के अफ़सर रहे। 1947 के बाद ये हिंदुस्तान की डिप्लोमैटिक सर्विस में भी काम करते रहे।

सबसे बड़ी बात ये है कि “जय हिंद” का नारा इसी शख़्स ने पहली बार पेश किया था।
“जय हिंद” का मतलब होता है — मुल्क की फतह, मुल्क की कामयाबी।

आज भी यह नारा फ़ौज के सलाम, हौसला-अफ़ज़ाई और हर तरह के आधिकारिक मौक़ों पर बड़े फ़ख़्र से बोला जाता है।
लोग इसे फिल्मों, तकरीरों और रोज़मर्रा की जिंदगी में भी इस्तेमाल करते हैं।

अबिद हसन सफ़रानी ने यह नारा सिर्फ़ एक शब्द नहीं दिया —
बल्कि एक जज़्बा,
एक हिम्मत,
और एकता की आवाज़ दी,
जो आज भी हर हिंदुस्तानी के दिल में बसती है।

Sunday, 9 November 2025

neet

 NEET की तैयारी करने वाले बच्चे के दिल में यही बात आती है कि

> “अगर मैं रोज़ बस आधा या एक घंटा पढ़ लूँ, तो क्या मैं डॉक्टर बन सकता हूँ?”



---

### 🌙 **पहला नुक्ता: सोच अच्छी है, मगर मेहनत ज़रूरी है**

**लफ़्ज़ में:**

> *"Dua ke saath dawa bhi ज़रूरी hoti hai."*

**मतलब:**
अल्लाह तआला सिर्फ़ उसी की मदद करते हैं जो **मेहनत** करता है।
कुरआन में अल्लाह फ़रमाता है (सूरह नज्म 39):

> “इन्सान के लिए वही है, जिसके लिए वह कोशिश करता है।”

यानि अगर कोई बच्चा बस आधा या एक घंटा पढ़े और बाकी वक्त mobile, chatting या सोने में गुज़ार दे —
तो यह उम्मीद करना कि Allah उसे *Government MBBS seat* दे देंगे, **ग़ैर-वाक़ेअ़त पसंद (unrealistic)** सोच है।

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### 📘 **दूसरा नुक्ता: NEET इम्तेहान का तर्क (Logic)**

**NEET का competition** बहुत सख्त होता है —
हर साल **20–25 लाख students** form भरते हैं,
और **sirf 80–90 हज़ार seats** होती हैं।

अब सोचो —
अगर हर 20 students में से सिर्फ़ 1 को seat मिले,
तो क्या वो एक घंटा पढ़ने वाला चुना जाएगा या 8–10 घंटे पढ़ने वाला?

⏱️ **Jawab साफ़ है:**
Allah इंसाफ़ करने वाला है —
वो उसी को सफलता देता है जिसने मेहनत, लगन और सब्र से पढ़ाई की हो।

---

### 🧠 **तीसरा नुक्ता: Logical सवाल जो खुद से पूछो**

> ❓ *अगर मैं दिन का 1 घंटा पढ़ता हूँ, तो बाकी 23 घंटे कौन पढ़ रहा है मेरे लिए?*

> ❓ *अगर मैं डॉक्टर बन जाऊँ, तो क्या मैं आधा घंटे की पढ़ाई से किसी मरीज़ की जान बचा पाऊँगा?*

> ❓ *क्या मैं उस हक़ के क़ाबिल हूँ जो एक सच्चे मेहनती डॉक्टर को मिलना चाहिए?*

इन सवालों के जवाब अगर ईमानदारी से दो, तो खुद समझ आ जाएगा कि
**आधा घंटा NEET के लिए काफी नहीं है।**

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### 🕰️ **चौथा नुक्ता: कितना वक्त देना चाहिए NEET के लिए**

📍 **अगर कोई 11वीं या 12वीं में है:**
कम से कम **6 से 8 घंटे रोज़** पढ़ना चाहिए —
जिसमें theory, MCQ practice और revision शामिल हो।

📍 **अगर drop year है:**
तो रोज़ाना **10–12 घंटे** focus से पढ़ाई करना चाहिए —
लेकिन बीच-बीच में छोटे breaks लेने चाहिए ताकि दिमाग़ fresh रहे।

📍 **अल्लाह पर भरोसा और दुआ भी ज़रूरी है:**
हर दिन पढ़ने से पहले “**Bismillah**” और पढ़ाई के बाद “**Alhamdulillah**” कहो।
इससे दिल को तसल्ली भी मिलेगी और मेहनत में बरकत भी होगी।

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### 💬 **ररूआ अंदाज़ में नसीहत:**

> “बेटा, अल्लाह तआला सिर्फ़ उन्हीं को कामयाबी देता है जो अपनी कोहशिश में सच्चे होते हैं।
> Dua करो, मगर saath me mehnat bhi karo.
> Sirf dua se doctor nahi banta, lekin dua aur mehnat dono mil jaayein,
> to Government College tak ka raasta bhi asaan ho jaata hai.”

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किन चीज़ों से बचना (Avoid these habits)

❌ Mobile scrolling (Instagram, YouTube, reels)
❌ Late-night जागना बिना पढ़ाई के
❌ दूसरों से compare करना
❌ “कल से पढ़ूँगा” वाला सोच रखना
❌ Group distraction (ज्यादा बातें, कम पढ़ाई)

Shakeel’s Suggestion – Doctor बनने का रास्ता

“अगर सच्चे दिल से डॉक्टर बनना है,
तो रोज़ 8–10 घंटे का वक्त अपने syllabus को दो,
1 घंटे को नहीं — पूरे दिन को अपने ख्वाब के हवाले करो।”

📿 हर दिन की शुरुआत “Bismillah” से करो,
और हर रात अपने दिल में यह सोच कर सोओ:

“आज मैं कल से बेहतर बना हूँ।”

### 🌹 **अख़िरी बात:**

अगर कोई बच्चा बस 1 घंटा पढ़कर सोचता है कि “Main doctor ban jaunga” —
तो यह **ख्वाब तो अच्छा है**, लेकिन **अंदाज़ ग़लत है।**
Allah Ta’ala *इरादे की सच्चाई* देखता है,
और *मेहनत की गहराई* के हिसाब से इनाम देता है।




Saturday, 8 November 2025

naat

तेरे ही सदक़े से रोशन जहाँ,
तेरे करम से बने दिल का मकाँ,
रहमत के साए, तू नबी-ए-अमाँ,
लब पे सदा तेरा नाम-ए-अमाँ,

तेरे ही सदक़े से रोशन जहाँ
तेरे → (उर्दू / हिंदी) "तुम्हारे" — यानी हज़रत मुहम्मद ﷺ की तरफ़ इशारा।

सदक़े से → (अरबी मूल صَدَقَة‎ / صدقہ) का मतलब होता है “कुर्बानी, बरकत, दान या रहमत की वजह से”।

रोशन → (फ़ारसी मूल) मतलब “उजाला, रौशनी से भरा हुआ”।

जहाँ → (फ़ारसी) मतलब “संसार, दुनिया”।

अर्थ:
"तेरे ही सदक़े से ये दुनिया रौशनी से भर गई।"
👉 यानी नबी ﷺ की रहमत और बरकत से सारी दुनिया में नूर फैल गया।

तेरे करम से बने दिल का मकाँ
करम → (अरबी / फ़ारसी) मतलब “मेहरबानी, रहमत, दया”।

बने → (हिंदी) मतलब “तैयार हुआ / बना”।

दिल → (फ़ारसी) मतलब “हृदय”।

मकाँ → (अरबी مكان) मतलब “ठिकाना, घर, स्थान”।

 अर्थ:
"तेरी रहमत से दिल को ठिकाना मिला।"
👉 यानी नबी ﷺ की दया से इंसान का दिल सुकून और इमान से भर गया।


रहमत के साए, तू नबी-ए-अमाँ

रहमत → (अरबी رحمة) मतलब “मेहरबानी, कृपा”।

साए → (फ़ारसी) मतलब “छाँव, संरक्षण”।

नबी-ए-अमाँ → दो शब्दों से बना है:

नबी (अरबी نبي) = “पैग़म्बर”

अमाँ (अरबी أمان) = “अमन, सुरक्षा, शांति”

 अर्थ:
"तू रहमत की छाँव है, ऐ अमन के पैग़म्बर!"
👉 यानी नबी ﷺ सारी इंसानियत के लिए अमन और रहमत लेकर आए।


लब पे सदा तेरा नाम-ए-अमाँ

लब → (फ़ारसी) मतलब “होंठ”।

सदा → (फ़ारसी / अरबी) मतलब “हमेशा, हर वक्त”।

तेरा नाम-ए-अमाँ →
नाम (फ़ारसी/हिंदी) = “नाम”
अमाँ (अरबी أمان) = “अमन, सुरक्षा”
अर्थ:
"हमारे होंठों पर हमेशा तेरे अमन का नाम रहे।"
👉 यानी हमेशा ज़ुबान पर नबी ﷺ का नाम और अमन की दुआ रहे।
Summary
“ऐ रहमत के पैग़म्बर ﷺ, तेरे ही सदक़े से ये जहाँ रौशन है, तेरे करम से हमारे दिलों को ठिकाना मिला।
तू रहमत और अमन की छाँव है, और हमारी ज़ुबान पर हमेशा तेरा नाम और अमन की दुआ रहती है।”



तेरा करम है, तेरी अता है,
हर साँस में तेरी सदा है,
दिल में बसाए तेरा नाम-ए-पाक,
तेरे ही नूर से महका फ़लक,
रौशन है दिल, तेरे हुस्न का ज़िक्र,
लब पे दरूद, दिल में फ़िक्र,




राहे मुहब्बत में ठहर जाए दिल,
तेरी अदा पे निखर जाए दिल,
तेरे कदमों में है जन्नत की राह,
तेरे ही नाम में छुपा है निगाह,
दिल में बसाए तेरी याद का फूल,
तेरे दर पर ही पाए उसूल,


तू जो थाम ले हाथ हमारा,
बदले मुक़द्दर का सारा नज़ारा,
तेरी दुआ से मिले इमां,
तेरे नूर से बने अरमान,
तू ही सहारा, तू ही निशाँ,
तू ही हबीब, तू ही जहाँ,
ओ मेरे दिल के सुकून

तू ही सहारा, तू ही निशाँ,
तू ही हबीब, तू ही जहाँ,
तेरे करम से मिले दिल को सबील,
तेरे नाम पे नाज़ करे “शकील”


ढरियहार वाले मियां चंदादरगाह की तामीर में सामान की शक्ल में मिलने वाले तआवुन की तफ्सील

ढरियहार वाले मियां चंदा दरगाह की तामीर में सामान की शक्ल में मिलने वाले तआवुन की तफ्सील 🔹 समीम खान ( मजीद खान) — 1000 ईंटें पेश की हैं। 🔹 ...

Shakil Ansari