Means मुझसे (जो कुछ भी) सुनो, उसे आगे पहुँचाओ, चाहे वह एक आयत ही क्यों न हो।"
इस्माईल-बिन-उमैया ने यहया-बिन-अब्दुल्लाह-बिन-सैफ़ी से, उन्होंने अबू-मअबद से और उन्होंने हज़रत इब्ने-अब्बास (रज़ि०) से रिवायत की कि जब रसूलुल्लाह ﷺ ने मुआज़ (रज़ि०) को यमन भेजा तो फ़रमाया : " तुम एक क़ौम के पास जाओगे (जो) अहले-किताब हैं, तो सबसे पहली बात जिस की तरफ़ तुम्हें उनको दावत देनी है। वो अल्लाह की इबादत है। जब वो अल्लाह को पहचान लें तो उन्हें बताना कि अल्लाह ने उनके दिन और रात में उन पर पाँच नमाज़ें फ़र्ज़ की हैं। जब इस पर अमल करने लगें तो उन्हें बताना कि अल्लाह ने उनपर ज़कात फ़र्ज़ की है। जो उनके (मालदारों के) मालों से लेकर उनके ग़रीबों को दी जाएगी। जब वो इसको मान लें तो उनसे (ज़कात) लेना और उन के ज़्यादा क़ीमती मालों से बचना।" सहीह मुस्लिम (हदीस संख्या 19)
हज़रत ज़ैद-बिन-साबित (रज़ि०) कहते हैं कि मैंने रसूलुल्लाह ﷺ को सुना, आप फ़रमाते थे : अल्लाह तआला इस शख़्स को ख़ुश-ख़ुर्रम और शादाब रखे जिसने हम से कोई हदीस सुनी फिर उसे याद किया और याद रखा ताकि उसे पहुँचाए, बहुत से इल्म और फ़िक़्ह के रखनेवाला अपने से बढ़ कर ज़्यादा दाना और फ़क़ीह (क़ानून का जानकार) लोगों को पहुँचाते हैं, और बहुत से इल्म और फ़िक़्ह के रखनेवाला ऐसे होते हैं जो हक़ीक़त में दाना और फ़क़ीह नहीं होते।सुनन अबू दाऊद (हदीस संख्या 3660)
Means जो व्यक्ति लोगों को हिदायत की ओर बुलाता है, उसे उन सभी लोगों के बराबर सवाब मिलेगा जो उसकी बात मानकर उस पर अमल करें, बिना उनके सवाब में कोई कमी किए।"
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