वह सारे लोग मेरी आँख में खटकते हैं,
जो लब पे शहद मगर बुग़्ज़ दिल में रखते हैं।
निशानियों में से उनकी निशानी ये भी है,
हर एक बात पर ये पीठ पीछे हँसते हैं।
तमाम खूबियाँ इनमें ही पाई जाती हैं,
ये नेक लोग हैं, सबको बुरा समझते हैं।
तमाम नुस्ख़ इन्हें दूसरों में दिखते हैं,
दिखाए आईना कोई तो ये गरजते हैं।
तुम ऐसे लोगों के मुँह न लगा करो 'शकील',
बीमार लोग हैं, खुद को ख़ुदा समझते हैं।
‘शकील’ सच की राह में चाहे अकेला ही सही,
झूठ के शहर में हम सर झुका के चलते नहीं।
ये दौर ऐसा है चेहरों पे नक़ाब रखते हैं,
अंदर से खोखले, बाहर से चमकते हैं।
जो सच की बात करे, उससे खफ़ा रहते हैं,
और झूठ बोलने वालों को सर पे रखते हैं।
‘शकील’ हम भी अब दुनिया को समझने लगे,
जो साथ चलते हैं अक्सर वही बदलते हैं।
भरोसा किस पे करें, ये भी समझ नहीं आता,
यहाँ तो अपने ही हर मोड़ पे छलते हैं।
नज़र मिलाते हैं लेकिन नज़र चुराते हैं,
ये लोग दिल में अलग, लब पे कुछ बताते हैं।
मुस्कुराहटों के पीछे दर्द छुपाते हैं,
जो सबसे ज़्यादा हँसते हैं, वही तन्हा रह जाते हैं।
किसी का हाल पूछना भी अब रिवाज़ सा है,
वरना अपने दर्द से लोग कहाँ जुड़ पाते हैं।
‘शकील’ दिल की सच्चाई संभाल कर रखना,
यहाँ तो सच्चे लोग ही सबसे ज़्यादा सताए जाते हैं।
हमने सीखा है ख़ामोशी में भी जी लेना,
क्योंकि हर ज़ख़्म यहाँ लफ़्ज़ों में नहीं बताए जाते हैं।
पहचान के काग़ज़ तो सबके पास होते हैं,
मगर असली चेहरे अक्सर छुपाए जाते हैं।
नाम, पता, नंबर से कौन किसी को समझ पाया,
यहाँ तो दिल के रिश्ते ही भुलाए जाते हैं।
‘शकील’ हम तो बस सच्चाई के सहारे जीते हैं,
वरना लोग तो हर मोड़ पे रंग बदलते जाते हैं।
भीड़ में रहकर भी तन्हा सा महसूस होता है,
जब अपने ही नज़रें चुरा के निकल जाते हैं।
जिसे अपना समझा, वही दर्द दे गया हमको,
अब तो हर रिश्ते में डर के साये नज़र आते हैं।
ये दुनिया काग़ज़ी पहचान पे यक़ीन करती है,
दिल के साफ़ लोग अक्सर ठुकराए जाते हैं।
‘शकील’ अब तो दुआ है बस इतना सा रब से,
सच्चे लोग इस जहाँ में थोड़ा तो मुस्कुराते हैं।
जब टूट के बिखरते हैं, सब सहारे छूट जाते हैं,
तब ख़ुदा के दर पे ही आँसू सुकून पाते हैं। 🤲
जो दिल से याद करे अपने रब को तन्हाई में,
उसके अंधेरों में भी उजाले उतर आते हैं।
रसूल ﷺ की मुहब्बत दिल में जब उतर जाए,
बिगड़े हुए रास्ते भी खुद-ब-खुद सँवर जाते हैं। ❤️
उनकी सीरत को जो अपना आईना बना लेते हैं,
वो नफ़रतों के बीच भी मोहब्बत फैलाते हैं।
‘शकील’ बस यही दौलत काफ़ी है इस ज़िंदगी में,
जो दिल में इश्क़-ए-इलाही और नबी ﷺ बसाते हैं।
ना दौलत काम आती है, ना शोहरत साथ जाती है,
बस नेक अमल ही इंसान को ऊँचा उठाते हैं।
जब दिल पे ग़म का अँधेरा बहुत ही छा जाता है,
ख़ुदा का नाम ही सीने को रौशन कर जाता है।
जो टूट के भी सजदा-ए-रब में झुक जाते हैं,
वही लोग हर इम्तिहान में कामयाब कहलाते हैं।
रात की तन्हाई में जो आँसू बहाते हैं,
वो ही सुबह सुकून का पैग़ाम पाते हैं।
रसूल ﷺ की सीरत को जो दिल में उतार लेते हैं,
वो नफ़रतों के दरिया में भी मोहब्बत बहाते हैं।
जो नाम-ए-मुस्तफ़ा ﷺ से अपने दिल को सजाते हैं,
उनके हर दर्द पे रहमत के फूल बरसते जाते हैं।
गुनाहों में घिर कर भी जो तौबा कर लेते हैं,
ख़ुदा के दर से वो खाली कभी नहीं जाते हैं।
‘शकील’ ये दुनिया चाहे जितना भी आज़माती रहे,
रब वाले हर हाल में मुस्कुराते ही जाते हैं।
जिस दिल में इश्क़-ए-नबी ﷺ की शमा जलती है,
वहाँ अँधेरे भी आकर खुद ही लौट जाते हैं। ✨
ना ताज चाहिए, ना कोई बड़ी पहचान हमें,
बस उनके उम्मती हैं, यही फख्र दिलाते हैं।
‘शकील’ जब-जब दिल टूट कर बिखर जाता है,
दरूद पढ़ते ही दिल फिर से सँवर जाते हैं।
जिन्होंने पत्थरों में भी दुआएँ ही उठाईं,
वही रहमत बनके हर दिल पे उतर आते हैं।
ताइफ़ की गलियों में लहू बहता रहा मगर,
लब पे फिर भी उनकी बस दुआएँ ही आते हैं।
जो दुश्मनों को भी माफ़ कर देना सिखाते हैं,
वही तो असल में नबी कहलाते हैं।
भूखे रहकर भी जो औरों को खिलाते रहे,
ऐसे सादगी के सितारे कहाँ मिल पाते हैं।
‘शकील’ सीरत-ए-नबी ﷺ को जो दिल में बसा ले,
उसके हर अंदाज़ में करम नज़र आते हैं।
अंधेरों में भी जिसने उजालों का सबक दिया,
वो नाम-ए-मुस्तफ़ा ﷺ दिल को रोशन कर जाते हैं।
जिसने बदले में पत्थर नहीं, मोहब्बत दी,
ऐसे किरदार पे फ़रिश्ते भी नाज़ करते हैं।
ज़ुल्म सहकर भी जिसने सब्र का रास्ता चुना,
वो ही उम्मत को जीने का हुनर सिखाते हैं।
‘शकील’ जब भी सीरत को पढ़ते हैं आँख भर आती है,
क्योंकि उसमें दर्द भी हैं और मरहम भी मिल जाते हैं।
ना ताज, ना तख़्त, ना कोई दुनिया की चाहत थी,
उनकी सादगी पे आज भी दिल झुक जाते हैं।
जिसने हर रिश्ते को इंसानियत से जोड़ा,
वो ही तो रहमत बनकर जहाँ में आते हैं।
दरूद की सदा जब लबों पे सज जाती है,
तो ग़म के बादल भी खुद-ब-खुद हट जाते हैं।
‘शकील’ बस यही राह-ए-नजात है इस जहाँ में,
जो नबी ﷺ के नक़्श-ए-कदम पे चल जाते हैं।
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