Wednesday, 11 December 2024

चींटी की नज़्म

ज़मीं के आँचल में छुपी कहानी,
चींटी ने रच दी मिसाल पुरानी।
राहें हों कठिन, आसमां हो दूर,
चींटी का जज़्बा रखो भरपूर।
संगठन, लगन और वफ़ा का नूर,
चींटी का सबक रहे हर मंज़ूर।

फेरेमोन से संवाद सजाएं,
बिन जुबां के जो बात बताएं।

रानी, मजदूर, सैनिक सब, अपनी-अपनी राह,
हर दाना जोड़ते हैं, करते हैं अपनी चाह।

जमीन के नीचे के महल, हैं इनके सपनों की बात,
जो दिखें नहीं पर हर कण में, बसी हुई उनकी जात।


छोटे कदम, बड़ा हौसला, हर राह करें आसान,
संगठन की मिसाल बनकर, दिखाती हर इंसान।


ज़मीं के सीने में वो खोदती हैं,
मिट्टी को सजीवता से जोड़ती हैं।
दुनिया के बोझ को उठाती हैं,
हर काम को दिल से निभाती हैं।

मिल-जुलकर संग वो चलती हैं,
मुश्किलों में हिम्मत से पलती हैं।
न कोई अहंकार, न कोई घमंड,
बस मेहनत की मिसाल हैं हर दिन।

खामोश फेरेमोन से जो बात करती हैं,
इंसानी संवाद की रीत समझाती हैं।
छोटे आकार में वो बड़ी सीख देती हैं,
ज़िंदगी को सादगी से जीना सिखाती हैं।

दुनिया की टेंशन

**नज़्म: टेंशन की दुनिया**  

पैसा, रोज़गार की कश्ती, बहती लहरों में गुम,  
ख्वाहिशें डूबती जाती हैं, दिल में उठते हैं सुम।  
नौकरी की तलाश में दिन-रात काटते हैं,  
हर सांस में बस मायूसियों को बांधते हैं।  

खुदा से मांगी थी दुआ, सेहत का बहार,  
मगर बीमारियों ने छीना हर इक करार।  
बच्चों की हंसी, बड़ों की दुआएं,  
पर खर्चों की लहरें सबको रुलाएं।  

रिश्तों का दरख़्त, जो कभी हरा था,  
आज उसकी शाखें टूट गईं, बस सूखा पड़ा था।  
प्यार के फूलों में कांटे उग आए,  
शादीशुदा जिंदगी के किस्से जलाए।  

भविष्य के ख्वाब, जो आंखों में पलते थे,  
आज डर की चादर में सब ढकते थे।  
बच्चों के सपने, अपनी हसरतें,  
सब अधूरी कहानियों में सिमटते थे।  

सुरक्षा का डर, अंधेरों का साया,  
हर गली में खौफ का गीत गाया।  
आतंक, लूट, और गुनाहों के खेल,  
ज़िंदगी के रंगों को किया बेरंग और धुंधले।  

दूसरों की सफलता, अपनी हार का दर्द,  
हर मुस्कान के पीछे जलन का गर्द।  
सोचते हैं क्यों नहीं हम उनके जैसे,  
खुद को छोटा समझते हैं ऐसे।  

काम के बोझ में दब गईं ख्वाहिशें,  
डेडलाइन की दौड़ में टूट गई सांसें।  
ऑफिस की सियासत, और प्रमोशन की होड़,  
दिल पर भारी हर रोज़ की दौड़।  

अतीत की गलतियां, जो पीछा नहीं छोड़तीं,  
पछतावे की आग में हर रात जलातीं।  
मौका जो खोया, लम्हा जो गया,  
वो ख्याल, हर लम्हा खामोशी में छाया।  

धर्म और इमान का सवाल,  
कर्मों का हिसाब, खुद से सवाल।  
शांति की तलाश, खुदा का सहारा,  
मगर हर दिल में एक खाली किनारा।  

टेंशन की इस दुनिया में राह ढूंढनी है,  
खुदा पर यकीन, और अपनी मंज़िल चुननी है।  
सबर और सुकून से हर दर्द सहे जाएंगे,  
इन परेशानियों के साए से बाहर आएंगे।  

**दर्द की पुकार**  

ऐ मेरे मालिक, सुन ले सदा,  
यह दिल है टूटा, है दर्द भरा।  
पैसे की खातिर हर रोज़ लड़ूं,  
रोटी के टुकड़े को लेकर झगड़ूं।  
जो मांगी थी बरकत, वो अब है कमी,  
सुकून का दिन देखा न कभी।  

बीमार जिस्म, थकान है भारी,  
दुआ करूं बच्चों की मैं खैरियारी।  
मां-बाप के सपने पूरे कहां,  
खुद भी बिखरा, संभालूं कहां?  

रिश्तों की गर्मी अब ठंडी पड़ी,  
प्यार की जगह, क्यों दीवार खड़ी?  
शौहर, बीवी, झगड़े हर रोज़,  
मोहब्बत के बदले, क्यों दिल में रोज़?  

भविष्य का डर सताता है मुझको,  
क्या होगा कल, यह तड़पता है मुझको।  
बच्चों का हाल, और अपनी जवानी,  
क्या इस सफर में मिलेगी आसानी?  

हर सपना टूटा, हर ख्वाहिश बिखरी,  
जो चाहा वो पाया न, बस धुंध ही दिखी।  
सुकून की तलाश में भटकता रहा,  
तेरे दर पे आकर, झुकता रहा।  

ऐ अल्लाह, मुझ पर रहमत बरसा,  
दिल के अंधेरों में रोशनी दिखा।  
तेरी रज़ा को समझूं, तेरी राह पकड़ूं,  
हर दर्द को भूलूं, हर ग़म से उबरूं।  

रोज़ की फिक्र और उलझन का हाल,  
सिर्फ तुझसे है मेरी फरियाद का सवाल।  
दिल को सुकून दे, रहमत का सहारा,  
तेरे नाम से ही बने सब कुछ हमारा।  


**नज़्म: टेंशन का किस्सा और रब की पुकार**  

ऐ मेरे रब, सुन ले मेरी पुकार,  
दिल में भरी है टेंशन की भरमार।  
दुनिया के झगड़े, रिश्तों की टूटन,  
हर ग़म से तंग है, मेरी ये धड़कन।  

पैसे का मसला, रोटी का सवाल,  
कभी नौकरी का डर, कभी व्यापार का हाल।  
खुदा, तू ही बता, ये जाल क्यों है?  
हर खुशी के पीछे ग़म का खेल क्यों है?  

बीमारियां घेरे, दवाओं का खर्चा,  
बूढ़े मां-बाप का हाल भी बिगड़ता।  
बच्चों के सपने, उनकी तालीम,  
हर पल बस सोचूं, कैसे होगी तक़रीम?  

रिश्तों में उलझन, झगड़े और फासले,  
कभी दिल को दुखाते, कभी बनाते हौसले।  
इज्जत का डर, नाम की चिंता,  
सच कहूं, ऐ रब, दिल बड़ा ही सिकुड़ता।  

भविष्य का डर, और अतीत का पछतावा,  
हर कोना खा जाए, दिल का सारा रसावा।  
सपने टूटे, उम्मीदें बुझीं,  
क्यों हर चाहत अधूरी ही रही?  

पर ऐ मेरे रब, जब तेरा सहारा,  
दिल को लगे, कोई अपना है हमारा।  
तेरी रहमत का किस्सा जब सुनूं,  
हर ग़म को मैं खुशी में बुनूं।  

तेरी तरफ देखूं, खुशी की आस लिए,  
जैसे प्यासा देखे, दरिया के क़रीब।  
सच कहूं, ऐ रब, हर खुशी तेरे साथ,  
तू ही है सुकून, तू ही मेरी बात।  

अब ना लूंगा टेंशन, तुझ पर यकीं,  
तूने ही लिखी है, मेरी ये ज़िंदगी।  
हर मुश्किल में तेरा ही सहारा,  
तेरी रहमत से हर दर्द भी गंवारा।  

ऐ मेरे रब, तू सुन मेरी दुआ,  
टेंशन की दुनिया से दे मुझे जुदा।  
बस तेरा साथ, और दिल का करार,  
सच कहूं, रब, तू ही है मेरा प्यार।


**नेमतें**  
ख़ुदा की नेमतें हैं बेशुमार,  
हर रोज़ इंसान करता है इज़हार।  
हवा जो सांसों को ताज़गी दे,  
पानी जो प्यास बुझा कर राहत दे।  

सूरज की किरणें, उजाले का नूर,  
धरती का सीना, फ़सलें भरपूर।  
बारिश की बूंदें, मिट्टी को तर करें,  
फिज़ा का सुकून, दिलों को असर करें।  

खुराक से पेट भरता है जहां,  
जानवरों की मेहनत, इंसान की शान।  
दिमाग और समझ, इंसान की दौलत,  
सेहत से मिलती है ज़िंदगी की हसरत।  

नदियां, पहाड़, और ज़मीन का ख़ज़ाना,  
हर नेमत है खुदा का नज़राना।  
पाक ज़मीं हो या हिंदुस्तान,  
दोनों में बसती है उसी की पहचान।  

ऐ खुदा, तेरा शुकर हर घड़ी, हर पल,  
तेरी नेमतों से बना है ये अमल।  
तेरा करम कभी न कम होगा,  
तेरी रहमतों से ज़माना रोशन होगा।


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यह रही एक छवि जो खुदा की दी हुई नेमतों और इंसान के शुक्राने को दर्शाती है। अब नज़्म पेश है:  

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**नेमतें खुदा की**  

हवा में घुली ताजगी की बात,  
पानी की वो बहती हर बारात।  
खुराक में लिपटी नेमतों का रंग,  
सूरज की रोशनी देती जीवन का संग।  

जमीन की मिट्टी में खुशबू है खास,  
जहाँ मेहनत से होती हर आस।  
जानवरों से मिलती राहत का एहसास,  
दूध, मांस और मेहनत के साथ।  

दिमाग जो सोच का दीप जलाए,  
समझ से इंसान बुलंदियाँ पाए।  
सेहत में बसी हर खुशी की जान,  
शुक्र करो, ये है रब का ईनाम।  

बारिश जो सोंधी खुशबू लाए,  
हर खेत-खलिहान में नई आस जगाए।  
फिजा में छुपा सुकून और प्यार,  
हर नेमत पे करो ऐतबार।  

खुदा की इनायतें हैं अनगिनत,  
इंसान हो जाए इनसे सराबोर मत।  
हर दिन, हर लम्हा शुक्र करो,  
नेमतों की कदर से जीवन भरो।  

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उम्मीद है कि यह नज़्म आपके दिल को छूएगी।

हवा के ऊपर नज़्म


**नज़्म: हवा की बातें**

हवा में उड़ी, जैसे कोई ख्वाब था,  
दिल में बसी, जो एक अजीब आंशिक आलम था।  

चली थी रात में, एक तूफान सा,  
घर की छत पर, टूटते थे हर एक सामान सा।  

तेज हवाओं में खो जाने का खौफ था,  
लेकिन जिंदगानी में, वो एक ख्वाब सा हौसला भी था।  

वो हवा जो कभी हमें ताजगी देती थी,  
अब वही हवा, हमें नज़रों में हर बार चुराती थी।  

पेड़ों के बगैर ये हवा बस आंधी बन जाती,  
मिट्टी के ऊपर से जब ये कटा करती जाती।  

आसमां में जब ये बवंडर लाती,  
इंसान की तरह यह हवा भी अपने रास्ते बदल जाती।  

लेकिन फिर भी, हवा में उम्मीद छुपी है,  
इंसान के दिल में भी एक ताजगी रची है।  

यह हवा कभी झोंके सी आती है,  
तो कभी तूफान बनकर सब कुछ पलट देती है।  

हमसे सीख, ये हवा खुद को समेट लेती है,  
जो बदल जाए, वही सच्चाई बन जाती है।  

हवा से बातें करता है, दिल का हर अफसाना,
ख्यालों में बसती है, जैसे कोई परवाना।

सफर में साथ देती है, ये हर मोड़ पे जाना,
तेज़ रफ्तार चलती है, कभी बन जाए दीवाना।
कभी सुकून देती है, जैसे कोई तराना,
कभी तूफान लाती है, बनकर कोई बयाना।

दरख्तों को हिलाती है, हर क़तरा जो ठिकाना,
फसलों को सहलाती है, ये धरती का नज़राना।

तूही हर खुशी का राज़, तूही हर ग़म पुराना,
तेरी नेमतें हैं लाखों, ऐ हवा, तेरा तराना।

हवा तू है एक जीवन का प्याला,
ऑक्सीजन से भरती है हर तिनका, हर हाला।
तेरे बिना, सासों का सफर अधूरा,
तेरे साथ ही तो मिलता है हर ह्रदय को पूरा।

तेरी बहकती लहरें मौसम को सिखाती हैं,
बारिश की बूंदों को तुझसे ही मिलाती हैं।
तू जब आती है, धरती को सहारा देती है,
पानी से लेकर खेतों को, ताजगी दे जाती है।




मकान के ऊपर एक नज़्म

घर की नज़्म 

यहाँ की हर खामोशी भी एक भाषा बोलती है,
माँ की हंसी में पूरी कायनात समाती है।

मकान न हो, तो इंसान कहाँ चैन से जी सकता है,
यह वही स्थान है जहाँ इंसान खुद को पा सकता है।

यह घर ही है जो हर सर्दी-गर्मी से बचाता है,
इसी घर में तो हर इंसान अपना सपना सजाता है।

मकान है वो ठिकाना, जहां सुकून मिलेगा,
इंसान को हर कदम पर, अपना घर मिलेगा।

ये घर नहीं सिर्फ दीवारों का ढांचा है,
यहाँ जज़्बात, रिश्ते और प्यार का रंग चंछा है।
मकान है वो स्थल, जहां चैन से सोते हैं,
इंसान की मेहनत, यहाँ फलते हैं।

द्वार से बाहर की दुनिया से, यहाँ सुरक्षा मिलती है,
घर की छांव में ही तो सच्ची राहत मिलती है।

हर दीवार में छुपी है, इक नई कहानी,
यहाँ के हर कोने में छुपी है इंसान की निशानी।

ये वही जगह है जहाँ इंसान को पहचान मिले,
मेहनत का फल और सच्ची ख़ुशियाँ यहाँ मिलें।

एक मकान नहीं, ये तो एक जन्नत का रूप है,
जहाँ दिल की शांति और घर का प्यार हो छुपा।

Tuesday, 10 December 2024

नज़्म की तशरीह

नज़्म की तशरीह
रूह है अमानत, इल्म-ए-रब का नूर,
जिस्म है साया, फरमान-ए-खुदा का सरूर।
आख़िरत का है सफर, हर अमल का हिसाब,
नेकियों की खेती कर, यही है ईमान का आदाब।

जिस्म को संभाल, ये है अमानत-ए-इलाही,
हराम से बच, चल राह-ए-हलाली।
फज़ा में घुला है, अरबी का अक्स,
इबादत से सजाओ, तस्बीह का नक्श।

दुनिया तो बस एक कारवां है फानी,
आख़िरत है मक्सद, जहां है रौशनी रब्बानी।
रूह-ए-मोअत्तर, मर्ज़ा-ए-रहमत,
जिस्म-ए-फानी, ताबीर-ए-अमानत।

शकील कर रहा फरियाद, रब की बारगाह में,
रूह पाक कर दे, गुनाहों की सियाह में।
दुआओं में सजी है, तस्बीह की आवाज,
रहम कर, ऐ खुदा, है तेरी ही परवाज़।

शकील फरियाद करता है, रब से ये इल्तिजा,
"रूह को पाक कर दे, दे अमल की रौशनी का सिला।"
शकील फरियाद कर, पाक हो रूह की जमीं,
दुआ में बस यही मांग, रहमतें हों हसीं।

आपके दिए गए शेर का अनुवाद, शब्दावली, और विस्तार से व्याख्या इस प्रकार है:

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शेर 1:
रूह है अमानत, इल्म-ए-रब का नूर,  
जिस्म है साया, फरमान-ए-खुदा का सरूर।

अनुवाद:  
रूह (आत्मा) एक अल्लाह की दी हुई अमानत है, जो उसके ज्ञान का प्रकाश है।  
शरीर मात्र एक छाया है, जो अल्लाह के आदेशों की खुशी और आनंद का प्रतिबिंब है।

शब्दावली:
-रूह (अरबी):आत्मा  
- अमानत (अरबी): अल्लाह द्वारा दी गई ज़िम्मेदारी  
- इल्म-ए-रब (अरबी): अल्लाह का ज्ञान  
- नूर (अरबी):प्रकाश  
- साया (फारसी):छाया  
- फरमान (फारसी):आदेश  
- सरूर (अरबी):खुशी या आनंद

विस्तार से: 
इस लाइन में बताया गया है कि रूह, यानी आत्मा, एक दिव्य तोहफा है, जो हमें अल्लाह से मिली है। यह आत्मा हमारी असली पहचान है, जबकि हमारा शरीर एक अस्थायी वस्तु है, जो अल्लाह के नियमों और आदेशों का पालन करने का माध्यम मात्र है। 

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शेर 2:
आख़िरत का है सफर, हर अमल का हिसाब,  
नेकियों की खेती कर, यही है ईमान का आदाब।

अनुवाद:  
आख़िरत (परलोक) की यात्रा निश्चित है, जहां हर कर्म का हिसाब होगा।  
इसलिए अच्छे कर्मों की खेती करो, यही सच्चे विश्वास (ईमान) का तरीका है। 

शब्दावली:  
- **आख़िरत (अरबी):** परलोक  
- **सफर (अरबी):** यात्रा  
- **अमल (अरबी):** कर्म  
- **हिसाब (अरबी):** लेखा-जोखा  
- **नेकी (फारसी):** अच्छा काम  
- **ईमान (अरबी):** विश्वास  
- **आदाब (अरबी):** शिष्टाचार या तरीका  

**विस्तार से:**  
यह शेर बताता है कि हमारी यह जिंदगी आख़िरत की तैयारी के लिए है। हर एक इंसान को अपने कर्मों का हिसाब देना होगा, 

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### **शेर 3:**
**जिस्म को संभाल, ये है अमानत-ए-इलाही,  
हराम से बच, चल राह-ए-हलाली।**

**अनुवाद:**  
अपने शरीर को संभालो, यह अल्लाह की दी हुई अमानत है।  
हराम (निषिद्ध) चीज़ों से बचो और हलाल (वैध) रास्ते पर चलो।

**शब्दावली:**  
- **जिस्म (फारसी):** शरीर  
- **अमानत-ए-इलाही (अरबी):** अल्लाह की दी हुई ज़िम्मेदारी  
- **हराम (अरबी):** निषिद्ध  
- **हलाल (अरबी):** वैध  
- **राह (फारसी):** रास्ता  

**विस्तार से:**  
यहां इस बात पर जोर दिया गया है कि हमारा शरीर भी एक अमानत है, जिसे हमें संभाल कर रखना चाहिए। हराम चीज़ें, जैसे अनैतिक आचरण और निषिद्ध भोजन या व्यवहार, हमें नुकसान पहुंचाते हैं। 

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### **शेर 4:**
**दुनिया तो बस एक कारवां है फानी,  
आख़िरत है मक्सद, जहां है रौशनी रब्बानी।**

**अनुवाद:**  
यह दुनिया एक अस्थायी यात्रा है।  
असली उद्देश्य तो आख़िरत है, जहां अल्लाह का प्रकाश और आनंद है।

**शब्दावली:**  
- **कारवां (फारसी):** यात्रा या काफिला  
- **फानी (अरबी):** अस्थायी  
- **मक्सद (अरबी):** उद्देश्य  
- **रौशनी (फारसी):** प्रकाश  
- **रब्बानी (अरबी): अल्लाह  

**विस्तार से:**  
दुनिया एक अस्थायी जगह है, और यहां की चीजें भी अस्थायी हैं। इंसान का असली मक्सद आख़िरत में सफलता पाना है। 

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शेर 5:
**रूह-ए-मोअत्तर, मर्ज़ा-ए-रहमत,  
जिस्म-ए-फानी, ताबीर-ए-अमानत।**

**अनुवाद:**  
आत्मा महकती हुई, अल्लाह की दया की निशानी है।  
जबकि नश्वर शरीर, एक अमानत का प्रतीक है।

**शब्दावली:**  
- **रूह-ए-मोअत्तर (अरबी):** सुगंधित आत्मा  
- **मर्ज़ा-ए-रहमत (अरबी):** कृपा का प्रतीक  
- **जिस्म-ए-फानी (फारसी):** नश्वर शरीर  
- **ताबीर (अरबी):** प्रतीक  
- **अमानत (अरबी):** ज़िम्मेदारी  

शेर 6:
शकील कर रहा फरियाद, रब की बारगाह में,
रूह पाक कर दे, गुनाहों की सियाह में।
दुआओं में सजी है, तस्बीह की आवाज,
रहम कर, ऐ खुदा, है तेरी ही परवाज़।

 1. नज़्म: शब्दावली
- **शकील**: अरबी ज़बान से लिया गया है। इसका मतलब है "सुंदर"  यह एक व्यक्ति का नाम है।
- **फरियाद**: फारसी ज़बान से लिया गया है। इसका मतलब है "गुहार" या "प्रार्थना।"
- **रब**: अरबी ज़बान से लिया गया है। इसका मतलब है "पालनहार" या "खुदा।"
- **बारगाह**: फारसी ज़बान से लिया गया है। मतलब है "दरबार" या "सर्वोच्च स्थान।"
- **रूह**: अरबी ज़बान से लिया गया है। इसका मतलब है "आत्मा।"
- **पाक**: फारसी ज़बान से लिया गया है। इसका मतलब है "पवित्र।"
- **गुनाहों**: अरबी ज़बान से लिया गया है। इसका मतलब है "पाप।"
- **सियाह**: फारसी ज़बान से लिया गया है। इसका मतलब है "काला" या "अंधकार।"
- **दुआओं**: अरबी ज़बान से लिया गया है। मतलब है "प्रार्थना।"
- **तस्बीह**: अरबी ज़बान से लिया गया है। मतलब है "खुदा का ज़िक्र।"
- **रहम**: अरबी ज़बान से लिया गया है। इसका मतलब है "दया।"
- **परवाज़**: फारसी ज़बान से लिया गया है। मतलब है "उड़ान।"

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2. नज़्म का अर्थ:
**पहली लाइन:**
_शकील कर रहा फरियाद, रब की बारगाह में।_  
इसका मतलब है कि शकील, जो एक गुनाहगार इंसान है, खुदा के दरबार में अपनी गलतियों की माफी मांग रहा है। वह अपने रब से अपनी मजबूरियों और गलतियों को माफ़ करने की प्रार्थना कर रहा है।  

**दूसरी लाइन:**
_रूह पाक कर दे, गुनाहों की सियाह में।_  
इसका मतलब है कि शकील अल्लाह से दुआ कर रहा है कि उसकी आत्मा, जो गुनाहों की कालिमा से दाग़दार हो चुकी है, उसे साफ़ और पवित्र कर दे।  

**तीसरी लाइन:**
_दुआओं में सजी है, तस्बीह की आवाज।_  
इसका मतलब है कि शकील की प्रार्थनाओं में खुदा की तस्बीह (महिमा) गूंज रही है। उसकी प्रार्थना में अल्लाह के नाम का ज़िक्र लगातार हो रहा है।  

**चौथी लाइन:**
_रहम कर, ऐ खुदा, है तेरी ही परवाज़।_  
इसका मतलब है कि शकील अल्लाह से रहमत की भीख मांग रहा है, क्योंकि हर रहमत और बरकत अल्लाह की ओर से आती है।  

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यह नज़्म अपने अंदाज़ में इतनी पुर-असर है कि इंसान को अपने गुनाहों पर तौबा का एहसास दिलाती है। शकील ने खुदा की बारगाह में जिस तरह फरियाद की है, वह हर इंसान के दिल की पुकार हो सकती है। अल्लाह की रहमत और माफी का दरवाजा हर वक्त खुला रहता है।  
 
*"ऐ खुदा, तेरी रहमत से ही हमें कामिल जिंदगी मिलती है। हमें तौबा की तौफीक दे और गुनाहों से निजात बख्श।"*

शेर 7:
शकील फरियाद करता है, रब से ये इल्तिजा,
"रूह को पाक कर दे, दे अमल की रौशनी का सिला।"
शकील फरियाद कर, पाक हो रूह की जमीं,
दुआ में बस यही मांग, रहमतें हों हसीं।

 नज़्म की तशरीह: 

**पहली लाइन**  
*"शकील फरियाद करता है, रब से ये इल्तिजा,"*  
- **शकील**: एक शख्स का नाम है, जिसका मतलब है "नर्म दिल इंसान" (अरबी लफ़्ज़)।  
- **फरियाद**: अरबी जबान का लफ़्ज़ है, जिसका मतलब है "दुआ, इल्तिजा या गिड़गिड़ाना।"  
- **इल्तिजा**: अरबी लफ़्ज़, जिसका मतलब है "गुज़ारिश, मांग।"  

मआनी (मतलब):  
शकील नाम का एक इंसान रब से रो-रोकर इल्तिजा कर रहा है कि उसकी रूह को पाक (पवित्र) कर दे।  

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**दूसरी लाइन**  
*"रूह को पाक कर दे, दे अमल की रौशनी का सिला।"*  
- **रूह**: अरबी लफ़्ज़, जिसका मतलब है "सांस, आत्मा।"  
- **पाक**: फ़ारसी लफ़्ज़, जिसका मतलब है "पवित्र।"  
- **अमल**: अरबी जबान का लफ़्ज़, मतलब "कर्म, अच्छा काम।"  
- **रौशनी**: फ़ारसी लफ़्ज़, जिसका मतलब है "प्रकाश।"  
- **सिला**: अरबी लफ़्ज़, मतलब "इनाम या फल।"  

**मआनी:**  
शकील रब से दुआ करता है कि उसकी आत्मा को पवित्र बना दे और जो अच्छे कर्म उसने किए हैं, उनका फल (इनाम) दे दे।  

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**तीसरी लाइन**  
*"शकील फरियाद कर, पाक हो रूह की जमीं,"*  
- **जमीं**: फ़ारसी लफ़्ज़, मतलब "धरती या जमीन।"  

**मआनी:**  
शकील अल्लाह से इल्तिजा करता है कि उसकी आत्मा की जमीन यानी उसका वजूद पवित्र हो जाए।  

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**चौथी लाइन**  
*"दुआ में बस यही मांग, रहमतें हों हसीं।"*  
- **रहमतें**: अरबी लफ़्ज़, मतलब "अल्लाह की मेहरबानी, करम।"  
- **हसीं**: फ़ारसी लफ़्ज़, जिसका मतलब है "खूबसूरत।"  

**मआनी:**  
शकील रब से मांगता है कि उसकी जिंदगी पर ऐसी रहमतें बरसें जो खूबसूरत और बरकतों से भरपूर हों।  

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शकील अपने रब के दर पर फरियादी है, इल्तिजा करता है कि उसके दिल और रूह को पाक कर दिया जाए। ये नज़्म अल्लाह से की गई एक मोहब्बत भरी दुआ का नमूना है। ये बताती है कि इंसान की कामयाबी उसके अच्छे अमल और अल्लाह की रहमत के मेल से मुकम्मल होती है।  

*"रब से इल्तिजा करो, वो तुम्हारी रूह को पाक कर दे और अपने करम की बारिश से तुम्हारी जिंदगी को हसीं बना दे।"*




विस्तार से:  
यह शेर इंसान की आत्मा और शरीर के महत्व को समझाता है। आत्मा, जो अल्लाह की कृपा का प्रतीक है, हमेशा शुद्ध और अमर रहती है। वहीं शरीर अस्थायी है और इसे सही तरीके से संभालना हमारी ज़िम्मेदारी है। 

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खुदा की नेमत और एक ख्वाब

**डॉक्टर बनने की दुआ**  
ऐ मालिक-ए-आलम, ऐ इल्म के खजाने,  
हर दुआ की मंज़िल, हर दर्द के मरहम के ठिकाने।  
तेरी रहमतों के तले, शकील का दिल झुका है,  
तेरी बारगाह में, उसकी दुआ का सफर रुका है।  

ऐ रहमान, मुझे इल्म की रोशनी से नवाज़ दे,  
दिल में तुझसे मिलने का शौक़ और जुनून साज़ दे।  
डॉक्टर बनने का मेरा ये ख़्वाब सच्चा कर दे,  
इल्म और हुनर का हर दरवाज़ा मुझ पर खुला कर दे।  

मुझे सिखा कि मैं हर ज़ख्म का मरहम बन जाऊं,  
हर ग़मगीन दिल का सहारा, हर मरीज़ का सुकून बन जाऊं।  
तेरी दी हुई नेमतों से दूसरों की मदद करूं,  
तू मेरा हाथ थाम, मैं हर मुश्किल में तेरी तरफ़ मुड़ूं।  

ऐ अज़ीज़, मुझे इतना इल्म अता कर,  
कि तेरे बंदों की खिदमत में कोई कमी न रह जाए।  
ऐ रहमान, मुझे वो सलीका सिखा दे,  
कि मेरे हर अमल में तेरा नूर झलक जाए।  
मेरा कलम दुआ लिखे, मेरी जुबां तेरी बात करे,  
मेरी सोच में तेरा करम, मेरी मेहनत में तेरा हुक्म रहे।  
ऐ अल्लाह, मुझे बना एक नेक और ईमानदार डॉक्टर,  
तेरे बंदों की खिदमत मेरा मक़सद हो, मेरी पहचान का मंजर।  

तेरे करम से ये सफर पूरा हो जाए,  
शकील का हर ख्वाब तेरे इश्क़ में पनाह पाए।  
तेरी रहमत से हर दर्द का इलाज बनूं,  
तेरे बंदों की खुशियों का साज बनूं।  

**आमीन।**  




### **खुदा की नेमत और एक ख्वाब**  

ऐ मेरे मौला, ऐ रहमतों के समंदर,  
तेरे करम का हर जर्रा है रोशन।  
तेरी नेमतें, तेरे इनाम बेपनाह हैं,  
तेरा हर लफ्ज़ मेरी दुआओं की जुबान है।  

हज़रत आदम से लेकर युसूफ अली सलाम तक,  
तेरी रहमत ने हर नबी को खास मकाम बख़्शा।  
हज़रत सुलेमान को जहां का मालिक बनाया,  
और नबी करीम को रहमत-उल-आलमीन बताया।  

ऐ मालिक, ऐ अर-रहमान, मेरी भी सुन ले,  
मेरे ख्वाब को अपनी कुदरत से बुन दे।  
डॉक्टर बनना है मुझे, तेरी मर्ज़ी का दीवाना,  
तेरी रहमत से भर दूं हर बीमार का ख़जाना।  

इल्म ऐसा दे दे, जो रोशनी फैलाए,  
इल्म ऐसा दे, जो इंसानियत का दर्द मिटाए।  
मेरे हाथों में हो तेरी शिफा का करिश्मा,  
हर दिल की धड़कन में सुनूं तेरा ही नज़ारा।  

तेरी नेमतों से बने हर ज़ख्म का मरहम,  
तेरे नाम से शुरू करूं हर अपना कदम।  
जैसे तूने दाऊद को हिकमत अता की,  
जैसे सुलेमान को सारी दुनिया की बख्शिश दी।  

ऐ अल्लाह, मुझे भी अपने ख्वाब का जरिया बना दे,  
तेरे बंदों की खिदमत में मेरा नाम रौशन कर दे।  
तेरे करम के हर लम्हे का कर्ज़ उतार सकूं,  
तेरे ही दर पर सजदा हर बार कर सकूं।  

ऐ अर-रहीम, मेरी यह फरियाद सुन ले,  
इस बंदे की दुआ को अपनी रहमत से बुन दे।  
मैं बन जाऊं तेरे नाम का डॉक्टर,  
हर दर्द का बनूं तेरे करम का मददगार।  

तेरी नेमतों का शुक्र, तेरी रहमतों का कर्ज़,  
तू जो कर दे, वही है मेरी जिंदगी का फर्ज़।  
ऐ रब्ब-उल-आलमीन, तेरी इबादत का यह नजराना,  
मेरे ख्वाब को हकीकत का जाम पहना देना।

__________### नज़्म: "खुदाई नेमतों का शुक्रिया"  

*ऐ रब्बे करीम, ऐ मालेक-ए-मुल्को जहान,*  
तेरी रहमतों का हरसू है बयान।  
जमीं, आसमान, ये दरिया, ये हवा,  
तेरी नेमतों का हर जर्रा है गवाह।  

*आदम से मुहम्मद तक, हर नबी की है दास्तान,*  
तेरे इरादों में छुपा, हर हिदायत का अरमान।  
नूह की कश्ती से, मूसा का असा,  
तेरे करम का हर मोज़िज़ा है रौशन सदा।  

*इब्राहीम की कुर्बानी, ईसा की बात,*  
तेरे हर नबी का है मुक़द्दस हालात।  
मीराज का मोज़िज़ा, कुरआन की हिदायत,  
मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की शफाअत।  

*ऐ मेरे मालिक, ऐ मेरे रब्बे रहमान,*  
शकील करता है तुझसे ये इल्तिज़ा अरमान।  
मुझे भी अता कर इल्म का नूर,  
डॉक्टर बना, कर दे मेरी तक़दीर का गुरूर।  

*मैं भी तेरी बंदगी का मन्सूर बनूं,*  
तेरी बनाई दुनिया का दस्तूर बनूं।  
बीमारों की मदद करूं, तेरी राह दिखाऊं,  
तेरे करम का सच्चा मआनी बताऊं।  

*तेरी हर नेमत पे करता हूं शुक्र,*  
तेरे करम पे है मेरा हर नज़र।  
तेरा करम, तेरी रहमत, है सब पे भारी,  
तेरा ज़िक्र, तेरी फज़ीलत, मेरे दिल की सवारी।  

*ऐ रब्बे करीम, सुन मेरी दुआ,*  
शकील की हसरत को दे तू वजह।  
तेरी रहमत से सब कुछ है आसान,  
तू है मालेक, तू ही है जहान।  

***~शकील***  

-----
**नज़्म:**

खुदाई नेमतों का शुकर अदा करूँ,  
रब की रहमतों का मैं एक जश्न सजा करूँ।  
क़ुदरत का ये जहाँ, क्या अनमोल हैं तुझसे,  
जिन्हें हर नबी ने जिया और सीखा है तू मुझसे।  

हज़रत आदम से लेकर मुहम्मद तक,  
हर नबी को मिला था कोई ख़ास तोहफ़ा,  
आदमी की तरह नहीं, वो खुदा के हबीब थे,  
जो राह दिखलाते थे हमें उसी रब के करीब।  

हज़रत इब्राहीम, हज़रत मूसा की तरह,  
तूफ़ानों का मुकाबला कर, हमें सिखा गए।  
हज़रत ईसा की मोज़िज़ा, हर दर्द का इलाज,  
क़ुदरत की खूबसूरती से सिखा रहे थे फ़र्ज़।  

मुझे भी एक दुआ है ऐ रबूल आलमीन,  
मुझे भी बना दे किसी दवा का हकीम।  
मेरे दिल में हो वो जोश, वो उम्मीद,  
मैं भी बनूँ एक डॉक्टर, तेरे क़दमों की भीड़।  

**शकील** की दुआ है तुझसे ए खुदा,  
मेरी राहों में रोशनी हो, तेरे ही करम से जुड़ा।  
मेरे जज़्बे को सजग कर, न थमने वाली उड़ान दे,  
तू ही है वो रब, जो मुझे डॉ. बना दे।  

तेरी नेमतें बेमिसाल हैं, हर लम्हा है तुझसे रोशन,  
तेरे दिए सब तोहफ़े, जीवन को बना देते हैं कुशान।  
मेरे हाथों में हो वो हुनर, जो तुझे पसंद आए,  
अल्लाह से यह दुआ, मेरा ज़िंदगी का रास्ता सजाए।  

साहिरन की राह पर, हर शख्स अपने रंग में हो,  
तू जो चाहे, वही मुझसे, तेरे हुक्म से सही हो।  
हमें जज़्बे में वो ताकत दे, जो हर मुश्किल से पार कर जाए,  
तू ही है वो रब, जो हमें हिम्मत और साहस दे जाए।  

**अल्लाह तुझसे दुआ करता हूँ, शकील का ये इरादा,**  
मेरे इरादों में तेरी रहमत हो, और हर मंज़िल हो रौशन।  
मेरे इरादे को पंख दे, और मेरी मेहनत को नज़रों में सजा,  
मेरी दुआ तेरे दर पर है, ऐ रब, यही है शकील की दुआ।


______**नज़्म: खुदाई की नेमतें और दुआ**

अल्लाह की नेमतें अनगिनत, नापा नहीं जा सकतीं,  
हर लम्हा ये हम पर बरसतीं, लाजवाब हैं ये सूरतें।  
कभी हवाओं में खुशबू, कभी बारिश की बूंदों में,  
हर इक नेमत में है सच्ची अल्लाह की दस्तक,  
अल्लाह की अज़मत, वो जो करे अपनी मर्जी,  
कभी हज़रत आदम को ज़िंदगी का शौंक दिया,  
तो कभी हज़रत नूह को एक कश्ती का हुक्म दिया।  

कभी हज़रत इब्राहीम को इम्तिहान लिया,  
तो कभी हज़रत मूसा को फिरऔन से आज़ादी दिलाई।  
ईसा की मोज़िज़ें रहीं, जी उठे मरीज़ों के अंदर,  
मुहम्मद (सल्ल.) की उम्मत को बेहतरीन बना दिया,  
फिर मीराज का जिक्र आया, हकीकत की तस्वीर सामने आई।  

इन तमाम नबियों के कामों की बयाँ,  
हमें सिखाते हैं सही राहों का मंज़र।  
अल्लाह का रहमाना करम, हर वक्त हम पर है,  
इन्हीं नेमतों के सहारे ही चल रहे हैं हम।  

कभी हम इन नेमतों को भूल जाते हैं,  
ख़ुदा की रहमत से दूर, दुनिया में खो जाते हैं।  
लेकिन जब याद आता है तू, हे रब,  
तेरी नेमतों की आहट से दिल झूम उठता है।  

शकील मांग रहा है तुझसे दुआ,  
हे अल्लाह, मुझे भी बना दे एक डॉक्टर, ऐ खालिक, ऐ सैयद!  
तू ही है जान और तेरा ही है इंकलाब,  
मेरी मेहनत, मेरा इरादा, तेरी रहमत में तब्दील कर दे।  

**दुआ:**  
"हे अल्लाह, अपनी इन तमाम नेमतों से हम पर और शकील पर अपना करम बरसाना,  
हमें अपनी राह पर चलने की तौफीक दे, हमारी मेहनत में तू अपनी मदद डाल दे।  
मुझे भी वही इज्जत और शौहरत दे, जो तूने अपने नबियों को दी,  
मैं भी उस मंज़िल तक पहुँचूँ, जहाँ हर सख़्स की दुआ पूरी हो।"  

**अल्लाह के दीन पर हर शख़्स की जिन्दगी को रौशन कर दे, और हज़रत आदम, हज़रत नूह, हज़रत इब्राहीम, हज़रत मूसा, हज़रत ईसा और हज़रत मुहम्मद (सल्ल.) की राह पर चलने की तौफीक दे।**

_______
खुदाई की नेमतों से तुज़ को फिर क्या चाहिए,
जो खुदा ने तुझे दिया, वह तुझसे न जाए।
हज़रत आदम की हदायत और जन्नत का रंग,
उनकी जोड़ी में हव्वा का प्यार था जो सच्चा संग।

हज़रत नूह की कश्ती में सब ने पाई राहत,
बच गए थे तूफान से, अल्लाह की थी यह दयावत।
मूसा का अता किया गया तौरेत का ज्ञान,
फिरऔन से मुक्ति, यह थी अल्लाह की पहचान।


मूसा के हाथ में था अता किया गया असा,
जिससे समुंदर को दो हिस्सों में किया था वह रसा।
ईसा का मोज़िज़ा, मरीज़ों को देता था सहारा,
अल्लाह की इजाज़त से हुआ था वह चमत्कारा।

अब तू याद कर, शकील तुझे फिर क्या चाहिए,
अल्लाह से तू मांग, तुझे डॉक्टर बनने की राह चाहिए।
उसने कभी न छोड़ा अपनी नेमतों का साया,
तेरे लिए भी है, बस तुझमें इيمان का नूर आया।

खुदा की नेमतें हैं अनगिनत, बेमिसाल,
हम सब पर उसकी रहमतें हैं, कितनी निहाल।
शकील, तू दुआ कर, खुदा से अपना हक़ ले,
तेरे लिए भी वो राहें हैं, बस तू खुदा से जुड़ ले।

खुदा की नेमतों का हम क्या बयान करें,
हर साँस में बसी हैं, कहाँ ये गुमान करें।
आदम को इल्म दिया, हव्वा का साथ दिया,
नूह को तूफान से बचने का नाव दिया।


ऐ रब्बुल इज्ज़त, तुझसे ये दुआ मांगता हूँ,
तेरी राहों में चलूँ, तेरा हर हुक्म मानता हूँ।
मुझे भी इल्म का नूर, अता कर दे रहमदिल,
डॉक्टर बना के मुझे, कर दे मेरा मुकद्दर दिल।

नूह को तूने कश्ती का हुनर बख़्श दिया,
तूफानों से लड़ने का सबक सिखा दिया।
इब्राहीम को तूने खलील का दर्जा दिया,
तेरी राह में कुर्बानी का जज्बा दिया।
मूसा को तूने कलाम का शرف बख़्श दिया,
लाठी से दरिया को दो हिस्सों में बांट दिया।
ईसा को तूने मोज़िज़ा-ए-शिफा बख़्श दिया,
मरीज़ों को राहत, मुर्दों को ज़िंदगी दे दिया।


### नज़्म: **खुदा की नेमतें और दुआएं**  

ए रब्बुल इज्जत, तेरी अज़मत का क्या बयान करूं,  
हर नेमत का शुक्र, तुझसे कैसे अरमान करूं।  
आदम को इल्म का तोहफा मिल जाए,  
जन्नत का हर दर खुल जाए।  

नूह को तूने कश्ती का सहारा दिया,  
हर तूफान में तूने उन्हें किनारा दिया।  
इब्राहीम को दोस्ती का मक़ाम मिल जाए,  
हर कुर्बानी का बेहतरीन इनाम मिल जाए।  

मूसा को तूने कलाम का शरफ दिया,  
फिरऔन के जुल्म से उनकी कौम को हक़ दिया।  
तौरेत का हर हर्फ़ मिल जाए,  
समुद्र के दो हिस्सों में खुदा का जलवा मिल जाए।  

ईसा को तूने मोज़िज़ों का अता दिया,  
मरीज़ों को शिफ़ा, मर्दों को ज़िंदगी का पता दिया।  
बिना पिता के पैदाइश का मुकाम मिल जाए,  
हर दर्द का मरहम और सलाम मिल जाए।  

मुहम्मद, रहमतुल्लिल आलमीन तेरा करम,  
कुरआन का हुक्म, हर अमल का भरम।  
मीराज की रात का वो मुकाम मिल जाए,  
जन्नत और जहन्नम का दीदार मिल जाए।  

तेरे ख्वाजा, तेरे चिश्ती के नाम से,  
रूह को मिले सुकून इस मुकाम से।  
हर आंसू में एक अमल मिल जाए,  
हर गुनाह में तेरा रहम मिल जाए।  

शकील की ये दुआ, रब्बे करीम सुन ले,  
डॉक्टर बनने का ख्वाब उसे हकीकत मिल जाए।  
तेरी नेमतों का हर पन्ना पढ़ने का हक़ मिल जाए,  
तेरी रहमतों का हर दर बंद न हो, सब कुछ मिल जाए।  

खुदाई की राह में हर मुश्किल हल हो,  
तेरी इबादत में हर सवाल का जलवा मिल जाए।  
आज़म और ख्वाजा के सदके से रब्ब,  
हर बंदे को तेरी रहमत का भरम मिल जाए।  
___
जब ज़ुल्म की हदें पार होती हैं,
खुदा की नज़रें सब देखती हैं।
वो जो मस्जिदें गिराते हैं,
अपनी तबाही खुद लाते हैं।

खुदा पाक सब देख रहा है,
हर जालिम पर हुक्म चल रहा है।
वो जलाल जब आएगा,
हर सितमगर मिट जाएगा।"

खुदा का नाम लेकर ये पैग़ाम देते हैं,
मोहब्बत के दिए हर अंधेरे में जलाते हैं।
ख्वाजा का दर वो मील है, जहां सुकून मिलता है,
हर मज़हब का बंदा यहाँ रहमत से मिलता है।

"तेरे दर की मिट्टी भी करामात दिखाती है,
हर ज़ख्म, हर ग़म की दवा ये बनाती है।"
लेकिन देखो, आज ज़माना कैसा बन गया,
मस्जिदें, दरगाहें नफ़रत का निशाना बन गया।

ये जालिम जो आज मज़हब को बेचते हैं,
नफ़रत की आग से सियासत को सेचते हैं।
खुदा के घर को गिराकर सोचते हैं ये,
कि इंसानियत का मक़सद बदल देंगे ये।


"जो ख्वाजा का दर गिराने चले थे,
वो खुद अपनी जड़ें जलाने चले थे।"
"ख्वाजा का पैग़ाम कभी मिट न सकेगा,
नफ़रत का हर ज़हर कभी टिक न सकेगा।"



**ख़ुदा का जलाल**  

*बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम*  

***"सदियों से जो गुलशन महक रहा था,  
   क्यों आज उसकी शराफ़त पे वार हुआ?  
   ख्वाजा के दर पे जो रौशनी थी,  
   क्यों उस पर भी अंधेरों का ख़ुमार हुआ?"***  

**माज़ी का आईना:**  
वो दौर था जब दिलों में मोहब्बत का असर था,  
हर शख़्स के लब पर सुकून का सफ़र था।  
मस्जिदें, मंदिर, गिरजा और दरगाहें,  
सबके लिए था इंसानियत का पैग़ाम।  
न मज़हब की दीवारें, न नफ़रत के अलार्म।  

**मौजूदा हालात:**  
आज जलती हैं मस्जिदें, मिटते हैं निशाँ,  
ख़ुदा के घरों पर क्यों ज़ुल्म का समाँ?  
अयोध्या की मिट्टी से उठती सदा,  
"खुदा देख रहा है, करेगा इंसाफ़ सदा।"  
संभल की गूंज, बदायूं का हाल,  
हुक्मरानों की चालें अब बेनक़ाब।  

***"जो ख्वाजा के दर पर झुका ना कभी,  
   वो समझेगा क्या मोहब्बत की जुबां?  
   जो तोड़ता मस्जिद, जो बांटता इंसां,  
   वो जानेगा क्या खुदा का इम्तिहां?"***  

**इंसान की तबाही:**  
पहले इंसान था इंसानियत का गुलाम,  
आज है वो नफ़रत का एक सस्ता सामान।  
जिस दिल में बसी थी मोहब्बत की बातें,  
आज वहीं छिपती हैं नफ़रत की रातें।  
सियासत के रंग में रंगे हुए सब,  
मज़हब के नाम पर बंट गए अब।  

**ख़ुदा का जलाल:**  
खुदा देख रहा है, सब करतूतें उनकी,  
हर दरगाह, हर मस्जिद की हालत वो सुनती।  
जब जलाल उठेगा, मिट्टी कांपेगी,  
ज़ालिम के इरादे रेत से बह जाएँगे।  

***"ख्वाजा का करम है, जो बचाएगा हमें,  
   उनका दर है रोशनी, जो राह दिखाएगा हमें।  
   हर पत्थर के पीछे है उसकी निगाह,  
   हर आह में छुपा है उसका वजूद का गवाह।"***  

**हमारा फर्ज़:**  
अब वक़्त है कि मोहब्बत का परचम उठाएँ,  
ख्वाजा की राह पर हर दिल को चलाएँ।  
मस्जिद हो, मंदिर, हो हर दरगाह,  
सबसे पहले बने इंसानियत का वाह।  

***"अय खुदा, हमें ऐसा सवेरा दिखा,  
   जहाँ हर मज़हब एक हो, हर दिल साफ़ हो।  
   जहाँ न मस्जिद गिरे, न मंदिर टूटे,  
   बस मोहब्बत के दर पर हर इंसान झुके।"***  

**आमीन।**

नज़्म: आग, पानी और ज़मीन

**आग, पानी और ज़मीन की पुकार**  
ज़िंदगी चंद रोज़ की मेहमानी है,
कर लो सहेरे में तियारी, ये इम्तिहानी है।
क़यामत का दिन आने वाला है,
इंसान, अपने कर्मों का हिसाब देने वाला है।

ऐ इंसान, सुन हमारी फ़रियाद,  
ख़ुदा ने दी थी हमें बड़ी नेमतों की सौगात।  
मगर तुमने किया हमारा ऐसा हाल,  
कि अब हमसे नहीं होता तुम्हारा सवाल।  

**आग बोल उठी:**  
"मैं थी रोशनी का ज़रिया,  
तुम्हारे घरों की चिराग़ों की जिया।  
मगर अब मैं बन गई जलती हुई बला,  
तुम्हारे लापरवाहियों से हर ओर फैली है सज़ा।  
अगर मैं इंसान से बदला लेना चाहूँ,  
तो हर चिंगारी से तुम्हारी दुनिया को जलाऊँ।  
हर जंगल, हर बस्ती राख में बदल दूँ,  
तुम्हारी सोच और लालच का अंत कर दूँ।"  

**पानी ने रोते हुए कहा:**  
"मैं थी तुम्हारी प्यास बुझाने का जरिया,  
नदी, दरिया, समंदर का था मेरा ज़रिया।  
मगर तुमने मुझे ज़हर बना दिया,  
हर बूँद को गंदगी से भर दिया।  
अगर मैं बदला लेना चाहूँ,  
तो हर बूँद को तुमसे दूर कर दूँ।  
सैलाब से तुम्हारी बस्तियाँ बहा दूँ,  
तुम्हारे खेतों को बंजर बना दूँ।"  
**ज़मीन ने गहरी सांस ली:**  
"मैं थी तुम्हारे रहने का आसरा,  
तुम्हारे हर कदम की थी गवाह।  
मगर तुमने मेरी छाती चीर डाली,  
अपने फायदे के लिए हर हरियाली काट डाली।  
अगर मैं बदला लेना चाहूँ,  
तो तुम्हें बेघर कर दूँ।  
तुम्हारे मकानों को खंडहर बना दूँ,  
तुम्हारी हर फसल को रेगिस्तान बना दूँ।"  
फिर तीनों ने एक साथ पुकारा,  
"ऐ इंसान, संभल जा अभी भी वक़्त है।  
हम बदला नहीं लेना चाहते,  
मगर हमारी सहनशीलता की हद है।  
ख़ुदा ने हमें तुम्हारे लिए भेजा था,  
हम पर रहम कर, ये ही ख्वाहिश है।"  

**पुकार खत्म हुई, खामोशी छा गई,  
क्या इंसान ने सुनी यह आवाज़?  
या फिर अपनी ज़िद और लालच में,  
अपने ही अंत की लिख दी इबारत?



______**नज़्म: आग, पानी और ज़मीन का इंसान से हिसाब**  

*आग की पुकार:*  
मैं वो आग हूँ, जो जलाती नहीं थी,  
तुम्हारे घरों को रोशन कराती थी।  
मगर इंसान, तूने जलाया मुझे,  
जंग का शोला बनाया मुझे।  
अब क़यामत के दिन, मैं अंगार बनूंगी,  
तेरे हर गुनाह को राख कर दूंगी।  


*पानी की चीख:*  
मैं वो पानी हूँ, जो प्यास बुझाता था,  
तुझे ज़िंदा रखने का हक़ अदा करता था।  
मगर तूने मुझे ज़हर बना दिया,  
नदियों को कूड़े से भर दिया।  
अब मैं सैलाब बनकर आऊंगा,  
तेरी बस्तियों को बहा ले जाऊंगा।  


*ज़मीन की फरियाद:*  
मैं वो ज़मीन हूँ, जो तेरी माँ थी,  
तुझे अनाज देती थी, हरियाली की गवाही थी।  
मगर तूने मेरी छाती चीर दी,  
मुझ पर जख्मों की बारिश कर दी।  
अब क़यामत के दिन, मैं फट जाऊंगी,  
तेरे हर जुल्म का हिसाब लाऊंगी।  


*तीनों का एकसाथ ऐलान:*  
आग कहेगी, जलाकर सिखा दूंगी,  
पानी कहेगा, बहाकर दिखा दूंगा।  
ज़मीन बोलेगी, दफ्न करके सुला दूंगी,  
खुदा का हुक्म होगा, इंसाफ दिखा दूंगी।  


*खुदा की आवाज़:*  
"इंसान, ये वो दिन है जब हिसाब होगा,  
तेरे हर गुनाह का जवाब होगा।  
आग, पानी, और ज़मीन मेरे गवाह हैं,  
आज से तेरा हर रास्ता सज़ा है।"  

यह नज़्म याद दिलाती है कि इंसान को कुदरत की कद्र करनी चाहिए, वरना क़यामत का दिन दूर नहीं।


समुद्र

समुद्र की गहरी नज़रें, दिलों को छू जाती हैं,
हर लहर में राज़, एक नई राह दिखाती हैं।

समुंदर की लहरों में एक ख़ास बात है,
हर लहर में छिपी एक नई रात है।
तूफ़ान भी आए तो, फिर सुकून आता है,
समुंदर की गहराई, इंसान की तरह सच्चाई छुपाता है।


समुद्र में लहरों की तरह इंसान भी बदलता है,
हर चुनौती के बाद, नया रूप ढालता है।
समुद्र का आकर्षण, जैसे दिल को बांध लेना,
इंसान की रुहानी राह में नई रोशनी का देना।


Qualified Entrance

Shakil Ansari