माल का कटरा जोड़ता है, उम्र भर मरने के लिए।
सुबह से शाम, शाम से रात,
रोटी की ख़ातिर भागता है,
कभी सच बेच देता है,
कभी ज़मीर को ही काटता है।
दौलत की दौड़ में ऐसा उलझा,
कि सुकून पीछे छूट गया,
दो वक़्त के खाने की फ़िक्र में,
ज़िंदगी जीना ही भूल गया।
कभी धूप में जला,
कभी छाँव को तरसा,
इस कमाने की आग में,
अपनों से भी बरसों बरसा।
मगर जब सांसें थक जाती हैं,
और रूह पिंजरे से उड़ जाती है,
ना माल साथ जाता है,
ना शान, ना सूरत जाती है।
बस रह जाती हैं यादें,
कुछ अच्छे कामों के निशान,
जिसने दिलों को जोड़ा हो,
वही कहलाता है इंसान।
कब्र की तन्हाई लंबी है,
कयामत तक का इंतज़ार,
वहाँ ना सिक्का काम आएगा,
ना रिश्ते, ना कारोबार।
वहाँ पूछेगा बस अमल तेरा,
क्या बोया था, क्या काटा,
किसका आंसू पोंछा तूने,
किसका दिल तूने बाँटा।
तो ऐ बंदे! अभी भी वक़्त है,
इस दौड़ को थोड़ा थाम ले,
दुनिया की ज़रूरत पूरी कर,
मगर आख़िरत भी संभाल ले।
ऐसा कुछ कर जा इस सफ़र में,
कि जाने के बाद भी नाम रहे,
मिट्टी ओढ़ ले जब जिस्म तेरा,
तो दुआओं में तेरा काम रहे।
“इंसान क्या-क्या नहीं करता दो वक़्त की रोटी के लिए,”
मतलब:
इंसान अपनी ज़िंदगी चलाने के लिए, सिर्फ़ पेट भरने के लिए, हर तरह की मेहनत, परेशानी और संघर्ष करता है।
यह लाइन बताती है कि रोज़ी की मजबूरी इंसान से बहुत कुछ करवा देती है।
“कभी ज़मीर बेच आता है, कभी ख़ुद को तोड़ देता है रोज़ी के लिए।”
मतलब:
कुछ लोग पेट की मजबूरी में गलत काम भी कर बैठते हैं,
अपना ईमान, अपने उसूल, अपनी इज़्ज़त तक कुर्बान कर देते हैं।
यह लाइन चेतावनी है कि रोज़ी के चक्कर में इंसान अपना जमीर न खो दे।
“दौलत की तलाश में शहर-दर-शहर भटकता है,”
मतलब:
इंसान पैसा कमाने के लिए अपने घर, अपने गाँव, अपने अपनों से दूर चला जाता है।
ज़िंदगी की असली जड़ें पीछे छूट जाती हैं।
“सुकून घर में रह जाता है, इंसान बाहर निकल जाता है।”
मतलब:
असल शांति घर और रिश्तों में होती है,
लेकिन इंसान उसे वहीं छोड़कर दौलत के पीछे भागता है।
यह लाइन सिखाती है कि सुकून बाहर नहीं, अंदर होता है।
“सुबह से शाम तक बस कमाने की फ़िक्र में रहता है,”
मतलब:
इंसान दिन-रात सिर्फ़ पैसा कमाने के बारे में सोचता रहता है,
उसके पास अपने लिए, अपने परिवार के लिए वक़्त नहीं बचता।
“ये भूल जाता है कि ज़िंदगी भी कोई चीज़ होती है।”
मतलब:
पैसे की दौड़ में इंसान यह भूल जाता है कि
हँसना, सुकून, रिश्ते, सेहत — ये भी ज़िंदगी का हिस्सा हैं।
“अच्छे-बुरे हर रास्ते से गुज़रता चला जाता है,”
मतलब:
कुछ लोग सही-गलत की पहचान छोड़ देते हैं,
बस मंज़िल (पैसा) दिखती है, रास्ता नहीं।
“बस पेट की आग है जो हर गुनाह को जायज़ बनाता है।”
मतलब:
भूख और लालच इंसान को यह बहाना दे देते हैं कि
“मजबूरी थी”, और वह गुनाह को भी सही समझने लगता है।
“मगर जब साँसों की डोरी अचानक टूट जाती है,”
मतलब:
मौत बिना बताए आ जाती है,
न उम्र पूछती है, न हालात।
“ना माल साथ जाता है, ना ही तिजोरी जाती है।”
मतलब:
मरने के बाद इंसान के साथ कोई पैसा, सोना, दौलत नहीं जाती।
सब यहीं रह जाता है
“रह जाती हैं तो बस यादें और किए हुए काम,”
मतलब:
इंसान के पीछे सिर्फ़ उसके कर्म और लोगों की यादें बचती हैं।
“कोई दुआ देता है, कोई करता है बदनाम।”
मतलब:
अगर इंसान अच्छा रहा, तो लोग दुआ देते हैं,
और अगर बुरा रहा, तो नाम भी खराब छोड़ जाता है।
“जिसने इंसानियत बोई, वो दिलों में ज़िंदा रहा,”
मतलब:
जो दूसरों के काम आया, मददगार रहा,
वह मरने के बाद भी लोगों के दिलों में ज़िंदा रहता है।
“जिसने सिर्फ़ दौलत जोड़ी, वो क़ब्र में तन्हा रहा।”
मतलब:
सिर्फ़ पैसा कमाने वाला इंसान,
आख़िर में अकेला रह जाता है, न इज़्ज़त, न दुआ।
“क़ब्र की तन्हाई में न पैसा काम आएगा,”
मतलब:
मौत के बाद न बैंक बैलेंस काम आता है,
न रिश्तेदारों की ताक़त।
“वहाँ तो बस तेरा अमल ही तेरे साथ जाएगा।”
मतलब:
अल्लाह के सामने सिर्फ़ अच्छे-बुरे काम देखे जाएंगे।
“क़यामत तक की नींद है, लंबा है वो सफ़र,”
मतलब:
क़ब्र की ज़िंदगी लंबी है,
इसलिए इसकी तैयारी ज़रूरी है।
“ख़ुदा जाने कैसा होगा वहाँ का मंज़र।”
मतलब:
वहाँ का हाल सिर्फ़ अल्लाह जानता है,
इसलिए इंसान को डर और उम्मीद दोनों में रहना चाहिए।
“इसलिए ऐ इंसान, अभी होश में आ जा,”
मतलब:
यह लाइन नसीहत है —
अब भी वक़्त है, सुधर जाओ।
“जो वक़्त मिला है, उसे नेकियों में लगा जा।”
मतलब:
ज़िंदगी का सही इस्तेमाल अच्छे कामों में करना चाहिए।
“इतना कमा कि ज़रूरत पूरी हो जाए,”
मतलब:
दौलत उतनी ही ठीक है जो ज़रूरत पूरी करे,
लालच नुकसान देता है।
“इतना अच्छा कर कि रूह भी मुस्कुरा जाए।”
मतलब:
इतने नेक काम करो कि दिल और रूह को सुकून मिले।
No comments:
Post a Comment