Friday, 28 February 2025

बच्चे के पैदा होने के बाद उसके कान में अज़ान देने का ज़िक्र हदीस में मिलता है, मगर क़ुरआन में इसका कोई सीधा हुक्म नहीं दिया गया। आइए इसे तफ्सील से समझते हैं।बच्चे के कान में अज़ान देना इस्लामी सुन्नत है, जो नबी (ﷺ) की हदीस से साबित है। यह अमल बच्चे को सबसे पहले अल्लाह की याद से जोड़ता है और उसे बुरी ताक़तों से बचाने का ज़रिया बनता है। कुरआन में इसका सीधा ज़िक्र नहीं है, मगर परवरिश और तरबियत से जुड़े कई आयात इसकी अहमियत को साबित करते हैं।

बच्चे के पैदा होने के बाद उसके कान में अज़ान देने का ज़िक्र हदीस में मिलता है, मगर क़ुरआन में इसका कोई सीधा हुक्म नहीं दिया गया। आइए इसे तफ्सील से समझते हैं।

हदीस में तज़किरा
रसूलुल्लाह (ﷺ) जब अपने नवासे हज़रत हसन (रज़ि.) पैदा हुए, तो आपने उनके दाहिने कान में अज़ान दी। इस सिलसिले में हदीस है:
हज़रत अबू-राफ़ेअ कहते हैं कि मैंने रसूलुल्लाह (सल्ल०) को देखा कि हसन -बिन-अली जब हज़रत फ़ातिमा (रज़ि०) से पैदा हुए तो आप (सल्ल०) ने हसन के कान में नमाज़ की अज़ान की तरह अज़ान दी। इमाम तिरमिज़ी कहते हैं : 1- ये हदीस हसन सही है। 2- अक़ीक़ा के मसले  में इस हदीस पर अमल है, जो नबी अकरम (सल्ल०) से कई सनदों से आई है कि लड़के की तरफ़ से दो बकरियाँ एक जैसी और लड़की की तरफ़ से एक बकरी ज़बह की जाए 3- नबी अकरम (सल्ल०) से ये भी रिवायत हुई है कि आप ने हसन की तरफ़ से एक बकरी ज़बह की कुछ आलिमों का मसलक इसी हदीस के मुवाफ़िक़ है। (तिर्मिज़ी: 1514)
1. अबू राफे़ (रज़ि.) से रिवायत है:
"मैंने रसूलुल्लाह (ﷺ) को देखा कि जब हज़रत हसन बिन अली (रज़ि.) पैदा हुए तो आपने उनके कान में अज़ान दी।"
(अबू दाऊद: 5105, तिर्मिज़ी: 1514)

2. इमाम तिर्मिज़ी रहमतुल्लाह अलैह फरमाते हैं:
"बच्चे के पैदा होने के बाद उसके कान में अज़ान देना सुन्नत है ताकि सबसे पहले अल्लाह का ज़िक्र उसके कान में पड़े।"

इस्लामी हिकमत (बुद्धिमानी) और फलसफा
सबसे पहला लफ़्ज़ अल्लाह का हो – जब बच्चा दुनिया में आता है, तो उसे सबसे पहले अल्लाह की वहदानियत और रसूल (ﷺ) की रिसालत का कलमा सुनाया जाता है।
शैतान से हिफ़ाज़त – हदीस में आता है कि जब बच्चा पैदा होता है, तो शैतान उसे तंग करने की कोशिश करता है। अज़ान उसकी हिफ़ाज़त का एक ज़रिया है।
इस्लाम की तालीम से आग़ाही – बच्चे के पैदा होते ही उसे यह अहसास कराया जाता है कि वह एक मुसलमान खानदान में आया है।

क़ुरआन की रौशनी में
हालांकि, क़ुरआन में सीधा हुक्म नहीं, लेकिन कुछ आयात को इससे जोड़कर देखा जा सकता है, जैसे:

1. "ऐ ईमान वालों! अपने आपको और अपने घरवालों को जहन्नम की आग से बचाओ।" (सूरह तहरीम: 6)
👉 इसका मतलब यह है कि हमें अपने बच्चों की तरबियत इस्लामी तालीम के मुताबिक करनी चाहिए।

2. "जो लोग अल्लाह के ज़िक्र से दिली इत्मीनान हासिल करते हैं।" (सूरह रअद: 28)
👉 जब बच्चा पैदा होता है और उसके कान में अज़ान दी जाती है, तो यह अल्लाह के ज़िक्र से उसकी ज़िंदगी की शुरुआत करने का अमल है।

अज़ान देने का तरीका
✅ दाहिने कान में अज़ान – बिल्कुल वैसे ही जैसे नमाज़ के लिए दी जाती है।
✅ बाएँ कान में तक़बीर (इक़ामत) – कुछ उलमा बाएँ कान में इक़ामत देने को भी मुस्तहब (पसंदीदा) बताते हैं।



कुरआन की रोशनी में
कुरआन में बच्चों के कान में अज़ान देने का सीधा ज़िक्र नहीं है, मगर इस्लामी तालीमात और नबी (ﷺ) की सुन्नत से यह अमल साबित है। कुरआन में यह हिदायत दी गई है कि बच्चों की सही इस्लामी परवरिश हो और उन्हें अल्लाह की याद से जोड़कर रखा जाए।

1. सूरह ताहा (20:132)
“और अपने घरवालों को नमाज़ का हुक्म दो और ख़ुद भी उस पर क़ायम रहो।"
➤ यह आयत इशारा करती है कि बच्चों की परवरिश इस्लामी उसूलों पर करनी चाहिए, और अज़ान देना इसी की एक शुरुआत है।

2. सूरह इब्राहीम (14:40)
“ऐ मेरे परवरदिगार! मुझे और मेरी औलाद को नमाज़ क़ायम करने वाला बना।"
➤ हज़रत इब्राहीम (عليه السلام) की यह दुआ बताती है कि औलाद को दीन पर चलाने की तरबियत देना अहम है, और अज़ान इसी की एक पहली सीढ़ी है।
क्या यह फर्ज़ है?
नहीं, यह सुन्नत है। अगर कोई न करे तो कोई गुनाह नहीं, मगर सुन्नत अमल करने से बरकत मिलती है।

नतीजा
बच्चे के पैदा होने के बाद उसके कान में अज़ान देना एक मुस्तहब सुन्नत अमल है, जो नबी (ﷺ) से साबित है। यह बच्चे को सबसे पहले अल्लाह की याद दिलाने और उसे बुरे असरात से बचाने का एक तरीका है।

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Shakil Ansari