Shakil Ansari

Friday, 30 January 2026

farewell day 2025 -26

मतला:
सितारे बनें हम, ताले न टूटें कभी,
(रदीफ़: कभी)
गाँव के बच्चों की तालीम हो रोशन और सच्ची कभी।

पहला शेर:
2017 से जो मैंने दिया तालीम का दफ़्तर,
गाँव की गलियों में गूँजे वही इल्म कभी।

दूसरा शेर:
लड़कियाँ पहली बार मैथ्स में आईं बराबरी की राह,
Equal Numbers, Infinite Memories, बन जाए माह कभी।

तीसरा शेर:
मार भी सीख है, लोहार लोहे पर चलता है,
पत्थर भी तरसे, तब ही मूर्तियाँ बनती हैं वाह कभी।

चौथा शेर:
अलीगढ़ से जो आया, दिया समय बच्चों को,
पैसा नहीं, कोशिश थी, हर दिल को मिली सच्चाई कभी।

पाँचवाँ शेर:
गाँव बदलता है सिर्फ़ तब, जब पढ़ें ज़्यादा,
ज्ञान की रोशनी से मिटे अज्ञान की घटाएँ कभी।

छठा शेर:
याद रहेंगे टीचर, जो सही और जो गलत सिखाए,
जिंदगी में आगे बढ़ते रहो, फर्क साफ़ दिखाई कभी।

मक़्ता (तख़ल्लुस – आपकी पहचान):
— तख़ल्लुस: “Shakil”
शक़ील कहता है, पढ़ाई और मेहनत ही मंज़िल है,
गाँव की गलियों में हर बच्चा रोशन बनाई कभी।

जहाँ बेटियाँ मैथ्स में आगे बढ़ीं, वहाँ बराबरी का दिया जलाया,
इन अनगिनत यादों में हर कदम, मेरा जज़्बात समाया।



अगले शेर

जहाँ बेटियाँ मैथ्स में आगे बढ़ीं, वहाँ बराबरी का दिया जलाया,
इन अनगिनत यादों में हर कदम, मेरा जज़्बात समाया।

शेर

लोहार लोहे पर वार करता है, मूरत वहीं बनती है,
पाठशाला की डगर में जो चोट लगी, वही सीख की असली तालीम है।

शेर

कई हंसी-मज़ाक, कई खेल, मैंने बच्चों को कराया,
ताकि जब कदम बाहर बढ़ें, तो हर भाषण में दम दिखाया।

शेर

गाँव की मिट्टी में बस पढ़ाई की खुशबू फैलाना,
हर घर से निकले सितारे, हर आँख में तालीम का नूर दिखाना।

शेर

जो सही सिखाया, वही साथ निभाया,
जो गलत राह दिखाई, समय ने उसका हिसाब चुकाया।

शेर

आलीगढ़ से मैं आता हूँ, अपना वक़्त देने,
क्योंकि दौलत नहीं, बल्कि ज्ञान ही बच्चों का खजाना बने।

मक़्ता (अंतिम शेर, तख़ल्लुस के साथ)

बराबरी, तालीम, बेटियाँ और सपने मेरी शायरी का हिस्सा हैं,
फ़ज़ील कहता है: पढ़ाई से ही गाँव और दुनिया का उजाला लिखा है


तख़ल्लुस: फ़ज़ील

मतला (पहली शेर, दोनों मिसरे क़ाफ़िया और रदीफ़ के साथ)

2017 से मैं पढ़ा रहा हूँ, बच्चों की दुनिया सँवारा,
हर गाँव के चेहरों में उजाला, हर दिल में ख़्वाब हमारा।


अगले शेर

जहाँ बेटियाँ मैथ्स में आगे बढ़ीं, वहाँ बराबरी का दिया जलाया,
इन अनगिनत यादों में हर कदम, मेरा जज़्बात समाया।


शेर

लोहार लोहे पर वार करता है, मूरत वहीं बनती है,
पाठशाला की डगर में जो चोट लगी, वही सीख की असली तालीम है।


शेर

कई हंसी-मज़ाक, कई खेल, मैंने बच्चों को कराया,
ताकि जब कदम बाहर बढ़ें, तो हर भाषण में दम दिखाया।


शेर

गाँव की मिट्टी में बस पढ़ाई की खुशबू फैलाना,
हर घर से निकले सितारे, हर आँख में तालीम का नूर दिखाना।


शेर

जो सही सिखाया, वही साथ निभाया,
जो गलत राह दिखाई, समय ने उसका हिसाब चुकाया।


शेर

आलीगढ़ से मैं आता हूँ, अपना वक़्त देने,
क्योंकि दौलत नहीं, बल्कि ज्ञान ही बच्चों का खजाना बने।


मक़्ता (अंतिम शेर, तख़ल्लुस के साथ)

बराबरी, तालीम, बेटियाँ और सपने मेरी शायरी का हिस्सा हैं,
फ़ज़ील कहता है: पढ़ाई से ही गाँव और दुनिया का उजाला लिखा है।


खास बातें इस ग़ज़ल की:

  1. रदीफ़ और क़ाफ़िया: “हमारा / समाया / जलाया / दिखाया / लिखा है”

  2. मतला: पहली शेर ने पूरी थीम सेट कर दी

  3. मक़्ता: फ़ज़ील का नाम, आपकी पहचान

  4. जज़्बात और कल्पना: बच्चों की दुनिया, तालीम की चमक, गाँव का उजाला

  5. थीम: Equal Numbers, Infinite Memories / बराबरी, बेटियाँ, मैथ्स


Tuesday, 13 January 2026

इंसान क्या-क्या नहीं करता, बस ज़िंदा रहने के लिए,माल का कटरा जोड़ता है, उम्र भर मरने के लिए।

इंसान क्या-क्या नहीं करता, बस ज़िंदा रहने के लिए,
माल का कटरा जोड़ता है, उम्र भर मरने के लिए।

सुबह से शाम, शाम से रात,
रोटी की ख़ातिर भागता है,
कभी सच बेच देता है,
कभी ज़मीर को ही काटता है।

दौलत की दौड़ में ऐसा उलझा,
कि सुकून पीछे छूट गया,
दो वक़्त के खाने की फ़िक्र में,
ज़िंदगी जीना ही भूल गया।

कभी धूप में जला,
कभी छाँव को तरसा,
इस कमाने की आग में,
अपनों से भी बरसों बरसा।

मगर जब सांसें थक जाती हैं,
और रूह पिंजरे से उड़ जाती है,
ना माल साथ जाता है,
ना शान, ना सूरत जाती है।

बस रह जाती हैं यादें,
कुछ अच्छे कामों के निशान,
जिसने दिलों को जोड़ा हो,
वही कहलाता है इंसान।

कब्र की तन्हाई लंबी है,
कयामत तक का इंतज़ार,
वहाँ ना सिक्का काम आएगा,
ना रिश्ते, ना कारोबार।

वहाँ पूछेगा बस अमल तेरा,
क्या बोया था, क्या काटा,
किसका आंसू पोंछा तूने,
किसका दिल तूने बाँटा।

तो ऐ बंदे! अभी भी वक़्त है,
इस दौड़ को थोड़ा थाम ले,
दुनिया की ज़रूरत पूरी कर,
मगर आख़िरत भी संभाल ले।

ऐसा कुछ कर जा इस सफ़र में,
कि जाने के बाद भी नाम रहे,
मिट्टी ओढ़ ले जब जिस्म तेरा,
तो दुआओं में तेरा काम रहे।


“इंसान क्या-क्या नहीं करता दो वक़्त की रोटी के लिए,”

मतलब:
इंसान अपनी ज़िंदगी चलाने के लिए, सिर्फ़ पेट भरने के लिए, हर तरह की मेहनत, परेशानी और संघर्ष करता है।
यह लाइन बताती है कि रोज़ी की मजबूरी इंसान से बहुत कुछ करवा देती है।



“कभी ज़मीर बेच आता है, कभी ख़ुद को तोड़ देता है रोज़ी के लिए।”

मतलब:
कुछ लोग पेट की मजबूरी में गलत काम भी कर बैठते हैं,
अपना ईमान, अपने उसूल, अपनी इज़्ज़त तक कुर्बान कर देते हैं।
यह लाइन चेतावनी है कि रोज़ी के चक्कर में इंसान अपना जमीर न खो दे।



“दौलत की तलाश में शहर-दर-शहर भटकता है,”

मतलब:
इंसान पैसा कमाने के लिए अपने घर, अपने गाँव, अपने अपनों से दूर चला जाता है।
ज़िंदगी की असली जड़ें पीछे छूट जाती हैं।



“सुकून घर में रह जाता है, इंसान बाहर निकल जाता है।”

मतलब:
असल शांति घर और रिश्तों में होती है,
लेकिन इंसान उसे वहीं छोड़कर दौलत के पीछे भागता है।
यह लाइन सिखाती है कि सुकून बाहर नहीं, अंदर होता है।



“सुबह से शाम तक बस कमाने की फ़िक्र में रहता है,”

मतलब:
इंसान दिन-रात सिर्फ़ पैसा कमाने के बारे में सोचता रहता है,
उसके पास अपने लिए, अपने परिवार के लिए वक़्त नहीं बचता।

“ये भूल जाता है कि ज़िंदगी भी कोई चीज़ होती है।”

मतलब:
पैसे की दौड़ में इंसान यह भूल जाता है कि
हँसना, सुकून, रिश्ते, सेहत — ये भी ज़िंदगी का हिस्सा हैं।



“अच्छे-बुरे हर रास्ते से गुज़रता चला जाता है,”

मतलब:
कुछ लोग सही-गलत की पहचान छोड़ देते हैं,
बस मंज़िल (पैसा) दिखती है, रास्ता नहीं।



“बस पेट की आग है जो हर गुनाह को जायज़ बनाता है।”

मतलब:
भूख और लालच इंसान को यह बहाना दे देते हैं कि
“मजबूरी थी”, और वह गुनाह को भी सही समझने लगता है।


“मगर जब साँसों की डोरी अचानक टूट जाती है,”

मतलब:
मौत बिना बताए आ जाती है,
न उम्र पूछती है, न हालात।



“ना माल साथ जाता है, ना ही तिजोरी जाती है।”

मतलब:
मरने के बाद इंसान के साथ कोई पैसा, सोना, दौलत नहीं जाती।
सब यहीं रह जाता है



“रह जाती हैं तो बस यादें और किए हुए काम,”

मतलब:
इंसान के पीछे सिर्फ़ उसके कर्म और लोगों की यादें बचती हैं।


“कोई दुआ देता है, कोई करता है बदनाम।”

मतलब:
अगर इंसान अच्छा रहा, तो लोग दुआ देते हैं,
और अगर बुरा रहा, तो नाम भी खराब छोड़ जाता है।



“जिसने इंसानियत बोई, वो दिलों में ज़िंदा रहा,”

मतलब:
जो दूसरों के काम आया, मददगार रहा,
वह मरने के बाद भी लोगों के दिलों में ज़िंदा रहता है।


“जिसने सिर्फ़ दौलत जोड़ी, वो क़ब्र में तन्हा रहा।”

मतलब:
सिर्फ़ पैसा कमाने वाला इंसान,
आख़िर में अकेला रह जाता है, न इज़्ज़त, न दुआ।


“क़ब्र की तन्हाई में न पैसा काम आएगा,”

मतलब:
मौत के बाद न बैंक बैलेंस काम आता है,
न रिश्तेदारों की ताक़त।




“वहाँ तो बस तेरा अमल ही तेरे साथ जाएगा।”

मतलब:
अल्लाह के सामने सिर्फ़ अच्छे-बुरे काम देखे जाएंगे।



“क़यामत तक की नींद है, लंबा है वो सफ़र,”

मतलब:
क़ब्र की ज़िंदगी लंबी है,
इसलिए इसकी तैयारी ज़रूरी है।



“ख़ुदा जाने कैसा होगा वहाँ का मंज़र।”

मतलब:
वहाँ का हाल सिर्फ़ अल्लाह जानता है,
इसलिए इंसान को डर और उम्मीद दोनों में रहना चाहिए।



“इसलिए ऐ इंसान, अभी होश में आ जा,”

मतलब:
यह लाइन नसीहत है —
अब भी वक़्त है, सुधर जाओ।



“जो वक़्त मिला है, उसे नेकियों में लगा जा।”

मतलब:
ज़िंदगी का सही इस्तेमाल अच्छे कामों में करना चाहिए।



“इतना कमा कि ज़रूरत पूरी हो जाए,”

मतलब:
दौलत उतनी ही ठीक है जो ज़रूरत पूरी करे,
लालच नुकसान देता है।



“इतना अच्छा कर कि रूह भी मुस्कुरा जाए।”

मतलब:
इतने नेक काम करो कि दिल और रूह को सुकून मिले।

Friday, 2 January 2026

अगर आपकी बेटी अपने फोन पर अपने किसी पुरुष टीचर (Male Teacher) से रोज़ाना या हफ्ते में बात कर रही है, तो उस पर नज़र रखना शुरू करें और टीचर को तुरंत ब्लॉक करवाएं!

अगर आपकी बेटी अपने फोन पर अपने किसी पुरुष टीचर (Male Teacher) से रोज़ाना या हफ्ते में बात कर रही है, तो उस पर नज़र रखना शुरू करें और टीचर को तुरंत ब्लॉक करवाएं!
एक टीचर के लिए किसी स्टूडेंट को 'इम्प्रेस' (प्रभावित) करना सबसे आसान काम होता है। अगर ये कम उम्र की बच्चियां हों, तो यह काम और भी आसान हो जाता है। मोबाइल फोन आने के बाद से कम उम्र की बच्चियां उनका आसान शिकार बन चुकी हैं। ये लोग आसान शिकार की तलाश में बच्चियों से संपर्क बढ़ाने या दोस्ती करने में जरा भी नहीं हिचकिचाते, हालांकि उनकी खुद की बेटियों की उम्र भी इन बच्चियों जितनी ही होती है...
और मुझे शर्म आती है कि मैं ऐसी बात कर रहा हूं, लेकिन हमारे यहां पुरुष टीचर्स की एक बड़ी संख्या है; कुछ टीचर्स अपनी फीमेल स्टूडेंट्स को एक आसान शिकार समझकर उन्हें फंसाने के चक्कर में रहते हैं। ऐसे कई मामले मैं अपनी आंखों के सामने देख चुका हूं। इस्लामियात (धार्मिक शिक्षा) का टीचर हो, नैतिकता का, बायो का या फिजिक्स का... आप विषय का नाम लें, मैं बता दूंगा कि फलां जगह फलां टीचर को अपनी छात्रा से शारीरिक फायदे (गलत इरादे) की खातिर रिश्ता बनाते हुए देखा है...
सबसे दुख की बात तो यह है कि ये लोग अपनी हरकत पर शर्मिंदा तक नहीं होते और पकड़े जाने पर बेशर्मी से कहते हैं कि कसूर बच्ची का है, उनका नहीं। और उनके साथ काम करने वाले (Colleagues) भी कोई कार्रवाई नहीं करवाते, क्योंकि डर होता है कि बाद में उनकी पोल भी वो शख्स खोल सकता है। बेशर्मी की इस कैटेगरी में उम्र का भी कोई लिहाज नहीं है; सत्तर साल के धार्मिक टीचर से लेकर 20-30 साल के मॉडर्न युवा टीचर तक, सब के सब इस मामले में एक जैसे ही नज़र आते हैं।
इसलिए, अगर आप अपनी बच्ची के मुंह से किसी पुरुष टीचर की ज़रूरत से ज़्यादा तारीफ सुन रहे हैं, बच्ची हर रोज़ और हर वक़्त उसी की तारीफ करती है, उस टीचर की तरफ से आपकी बच्ची पर अहसान भी किए जा रहे हैं और मोबाइल से बातचीत भी हो रही है, तो आसानी से समझ जाएं कि वह टीचर किस 'शिकार' की तलाश में हो सकता है। हमारे समाज का यह शर्मनाक पहलू जिस दिन मैंने देखा था, मुझे बेहद अफ़सोस हुआ, मगर यह एक कड़वी सच्चाई है। यहां तक कि साथ वाले टीचर्स भी जानते हैं कि किस घटिया आदमी की नज़र आजकल किस स्टूडेंट पर है और वह उसे ऑफिस में कब बुला रहा है। हमारे यहां इस टॉपिक पर बात करना मना (Taboo) समझा जाता है और माएं बच्चियों को नहीं बतातीं कि कौन सी हरकत गंदी हो सकती है और कैसे सामने वाले को अपनी हद (Limit) में रखना चाहिए। मगर ये बातें बच्चियों को समझाना बहुत ज़रूरी है, इससे पहले कि वो किसी का शिकार बनें।
माफ़ी चाहता हूं, प्लीज माफ़ कर देना!
इस लेख में किसी एक व्यक्ति को निशाना नहीं बनाया गया है, बल्कि हमारे समाज में होने वाली गलतियों की तरफ इशारा किया गया है।
शुक्रिया... खुश रहें, खुशियां बांटें, अपना और अपनों का ख्याल रखें।
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